जिसका इंतज़ार है उसको फ़िक्र तक नहीं,
उसकी ज़ुबाँ पे मेरा ज़िक्र तक नहीं...!
मोहब्बत में एक ही कमी है,
एक तड़पता है तो दूसरे को क़दर तक नहीं...!
वो पूछते हैं हाल भी तो रस्म निभाने को,
उनकी निगाह में अब कोई असर तक नहीं।
हमने तो सौंप दी थी उसे ज़िंदगी अपनी,
और उसे हमारे दर्द की ख़बर तक नहीं।
कितना अजीब है ये इश्क़ का दस्तूर भी,
जिसे चाहो टूटकर, उसे सब्र तक नहीं।
वो मेरे नाम से भी अब अनजान बन गया,
जिसके लिए कभी कोई और मंज़र देखा तक नहीं ।
हमने हर एक दर्द हँसकर छुपा लिया मगर,
उसे मेरी आँखों में समंदर तक दिखा नहीं !
जिसे समझा था मुकद्दर अपनी मोहब्बत का,
उसे मेरे जाने का भी असर हुआ तक नहीं
किससे करें अब शिकवा-ए-बेवफ़ाई,
जिसे चाहा टूटकर उसने मुड़कर देखा तक नहीं।