" इन नशीली निगाहों से आपने हमको
जो अपना दीवाना बनाया है सनम
कहीं ये इन आंखों की कोई
खूबसूरत चाल तो नहीं ?
ये जो भीनी सी खुशबू बिखरी है
हर ओर कहीं इनकी वज़ह
तुम्हारे ये लहराते हुए बाल तो नहीं ?
जिनसे रिस कर अब भी गिर रही है
पानी की कुछ बूंदें जो बिन मौसम भी
बारिश बन कुछ भीगा सी रही है तुम्हें
क्या इतना हक़ मैं भी रखता हूं ?
की एक बार तुम्हारी इन उलझी
जुल्फों को सवार सकूं ? "