एक ही धारा
तुम भागीरथी से शांत प्रिय,
मैं अलकनंदा सी चंचल हूं ॥
तुम्हारी गहराई में खो जाऊं,
तुम्हारे किनारे पर निकलूं ॥
तुम समंदर की गहराई जैसे ,
मैं उसमें खो जाती हूं ॥
हैं छिपे हजारों शब्द मौन में तुम्हारे ,
मेरी बातों में बहती लहर हजारों है ॥
तुम पहाड़ों जैसे हो अडिग प्रिय ,
मैं उसमें झरनों सी बहती हूं ॥
तुम सहनशील हो , जैसे गहराई कोई शांत ,
मैं जिद्दी हूं , लहरों सी तुमसे टकराती हूं ॥
और एक दिन ऐसा आएगा प्रिय ,
जब सारी दूरियां मिट जाएंगी ॥
मिलकर हम देवप्रयाग बन जाएंगे ,
जहां दो धाराएं एक संगम बन जाएंगी ॥
न तुम अकेले रहोगे, न मैं अकेली ,
हमारा नाम होगा - एक ही धारा ॥
- Manshi Thakur