एक बूंद बादलों की गोद में बैठी सोच रही थी। नीचे कितनी गर्मी है, अगर मैं बाहर गई तो गर्मी में भाप बन जाऊंगी। मनुष्य कितना स्वार्थी हो गया है। जंगल काटकर शहर बसाए जा रहा है। ओजोन लेयर का छेद बढ़ता जा रहा है। हे मूर्ख मनुष्य! देख धरती तप रही है। प्रशांत महासागर का पानी उबल रहा है। बड़े पेड़ ही तो मिट्टी का कटाव रोकते हैं, बादलों को खींचते हैं, मैं अकेली बूंद तो खुद भाप बन उड़ जाऊंगी, बारिश को तरस जाओगे, फसलें कैसे उगाओगे, अन्न नहीं होगा तो क्या खाओगे।
अब भी वक्त है सुधर जाओ, पेड़ लगाओ, जंगल बचाओ धरती सजाओ, भविष्य बचाओ।
जनसंख्या नियंत्रण और बढ़ता शहरीकरण धरती को तबाह कर रहा है। अगर अब भी मनुष्य ने खुद को नहीं सुधारा तो आनेवाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी। इस जहरीली हवा में कैसे जियेगी।
प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। जनसंख्या बढ़ती जा रही है। जिधर देखो बस भीड़ दिखाई देती है। सड़कों पर लंबे ट्रैफिक जाम, पहाड़ों पर बढ़ता भार, तभी तो होते हैं जगह-जगह भू-स्खलन। नदियां अब नाला बन गई। गाँव अब शहर हो गए। बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। आने वाले समय में वही जीवित रह पायेगा, जिसके पास जमीन है, जो अन्न उगाता है।
आज हर सब्जी, फल में केमिकल आ रहा है।
दिल्ली में तो आज भी बड़े घर मिल जाते हैं देखने को।
लेकिन मुंबई का तो बुरा हाल है। डिब्बे-नुमा घर में, उस
मुर्गियों की तरह बंद आदमी। बस सोने लायक जगह मिलती
है एक आदमी को। पहले लोग खेती छोड़ भागते थे
शहर नौकरी के लिए। अब नौकरी छोड़ भाग रहे हैं
गाँव खेती के लिए। क्योंकि बेरोजगारी इतनी है
कंपनियों को सस्ते मजदूर मिल जाते हैं तो वे ज्यादा
क्यों दे। अमेरिका और ईरान के लंबे युद्ध के
चलते ग्लोबल मार्केट में मंदी आई हुई है। विदेशो से भारतीय वापिस आ रहे हैं। कैसा समय
है ये हर जगह निराशा की धुंध छाई हुई है।
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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली