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मैं नास्तिक हूं
मैं नास्तिक हूं, मतलब ये नहीं कि
मेरे पास दिल या इंसानियत की कमी है...
मैने भगवान को मंदिर में नहीं
इंसानों के आंखों में दर्द बन कर देखा हैं।
धर्म अगर सच में पवित्र होता
तो वो कभी भी नफरत नहीं सिखाता...
न किसी को ऊंचा दिखाता
न ही किसी को नीचा बताता।
मैंने पूजा में झुके हुए सिर देखें
और दान–पेटी में धन भी
क्या भगवान इतना गरीब है
जो भक्तों से धन मांग रहा?
या भक्त अपने काम निकालने के लिए
भगवान को ही रिश्वत दे रहा?
अगर ईश्वर सच में न्याय करता
तो एक भी न्यायालय नहीं होता,
अगर खुदा सब कुछ ठीक करता
तो आज एक भी आसपास नहीं होता,
विद्या अगर सरस्वती से मिलता
तो आज एक भी विद्यालय नहीं बनता...
न धर्म के नाम पर आपस में लड़ता
न ही दुनिया में इतना अत्याचार चलता...
मैं नास्तिक हूं क्योंकि
मैंने डर से जन्मा विश्वास,
और विश्वास से पैदा हुआ नफरत देखा।
धर्म नहीं चाहिए मुझे इंसान बनाने के लिए
इंसानियत चाहिए मुझे धर्म से पहले...