सांझ का इंतज़ार मुझे हमेशा से था, इंतज़ार तो मुझे आपका भी था,
ऐसे ही थोड़ी न मैने आपको मेरी प्रिये कह डाला, ऐसे ही थोड़ी न, मैने आपको मेरी सांझ की दुल्हन कह डाला।
पर मुझे वो शाम पसंद नहीं थी ,जिसमें आपका ज़िक्र न हुआ हो।
मुझे वो शाम भी पसंद नहीं थी जिस शाम आप मुझ से दूर चली जाती थी।
मुझे तो वो शाम पसंद है जिसमें आप मेरे पास होती थीं,
वो सुबह जिसमें आपके कंठ से निकले एक एक स्वर मेरी हसीन सुबह को और खूबसूरत बनाते थे।
गगन भले ही कुछ न बोले, ये अवनी भले ही कुछ न कहे,
पर सब जानते हैं आपके प्रति मेरे हृदय में क्या बसा हुआ है।
शायद एक शहर बसा हुआ जिसमें आपकी यादों के सिवा और कोई निवास नहीं करता।
शायद एक तालाब है, जिसकी मछलियाँ व्याकुल हैं, आपके दर्शन के लिए।
मेरे हृदय में बैठे हुए जो भी मेरी भावनाएं हैं, सब जानते हैं और चिल्ला चिल्लाकर कह रही हैं " आप मत जाइए। "
क्योंकि वो जानते हैं किसी से दूर जाने की पीड़ा , किसी को छोड़ जाने का कष्ट।
अगर ये कुछ न होता ,तो शायद कुछ न होता
मगर ये सब जानते हैं अगर आप न होतीं,तो शायद मैं
न होता।
धन्यवाद