कोई बताए मुझे कि बेमौत मरते कैसे हैं,
मैं मौत के इंतज़ार में मर रही हूँ।
ये चीखें, ये दर्द, ये घुटन, ये अँधेरा खुद में समाए,
खुद से ही रोज़ लड़ रही हूँ।
उम्मीदें क्या होती हैं, ये याद नहीं,
अब कुछ भी बाकी नहीं रहा।
रोज़ अंत की ओर चल रही हूँ....
— Ankahi ✍️
- Ankahi