भाग–2: सबसे बड़ा राज़
आरव के हाथ काँप रहे थे।
उसने पत्र को दोबारा पढ़ा—
"जो बच्ची तुम्हें यह पत्र दे रही है, वह मेरी बेटी है..."
आरव की आँखें उस छोटी बच्ची पर टिक गईं।
"तुम्हारा नाम क्या है?" उसने धीमे से पूछा।
"आर्या," बच्ची मुस्कुराकर बोली।
"और... तुम्हारे पापा?"
बच्ची कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
"मम्मी कहती थीं कि मेरे पापा बहुत अच्छे इंसान हैं, लेकिन उन्हें मेरे बारे में कभी नहीं बताया गया।"
आरव के दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
वह बच्ची को लेकर पास की एक बेंच पर बैठ गया।
"तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं?"
आर्या की मुस्कान अचानक गायब हो गई।
उसने आसमान की ओर देखा और बोली—
"मम्मी अब तारों में रहती हैं।"
आरव की आँखें भर आईं।
उसने काँपते हाथों से पत्र का आख़िरी पन्ना खोला, जो लिफाफे में छिपा हुआ था।
उसमें लिखा था—
"आरव,
अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो मैं इस दुनिया से जा चुकी हूँ।
आर्या तुम्हारी बेटी है।
हाँ, मैं सच छिपाती रही।
जब मुझे अपनी बीमारी का पता चला, तब मैं तुम्हारी ज़िंदगी बोझ नहीं बनना चाहती थी।
इसलिए बिना बताए चली गई।
मुझे लगा था कि मैं कुछ महीनों में मर जाऊँगी, लेकिन भगवान ने मुझे पाँच साल और दे दिए।
उन पाँच सालों में मैंने सिर्फ़ एक काम किया—
हमारी बेटी को पालना।"
आरव की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
जिस प्यार को वह खो चुका समझ बैठा था, उसकी एक निशानी उसके सामने खड़ी थी।
पत्र में आगे लिखा था—
"मैंने आर्या को तुम्हारे बारे में सब बताया है।
अगर कभी तुम उससे मिलो, तो उसे यह एहसास मत होने देना कि वह अनाथ है।
उसे उसका पिता मिल जाना चाहिए।"
आरव ने तुरंत आर्या को अपने सीने से लगा लिया।
आर्या ने मासूमियत से पूछा—
"क्या आप रो रहे हैं?"
आरव मुस्कुराया।
"नहीं... ये खुशी के आँसू हैं।"
लेकिन उसी समय आर्या ने एक और बात कही—
"मम्मी ने कहा था कि अगर मैं आपको मिलूँ, तो एक डायरी ज़रूर दूँ।"
"डायरी?" आरव चौंका।
आर्या ने अपने बैग से एक पुरानी नीली डायरी निकाली।
उस डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
"इस डायरी में एक ऐसा सच छिपा है, जो आरव की पूरी दुनिया बदल देगा..."
आरव ने जैसे ही पहला पन्ना खोला, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
क्योंकि उस पन्ने पर लिखा था—
"जिसे तुम अपनी किस्मत समझते रहे... वह दरअसल एक साज़िश थी।"
(भाग–3 में जारी...) 📖✨
अब कहानी में प्रेम के साथ रहस्य और बड़ा ट्विस्ट शुरू होगा।