## **आखिरी ट्रेन**
मुंबई की एक ठंडी और बारिश भरी रात थी।
अर्जुन, एक युवा लेखक, रेलवे स्टेशन पर अकेला बैठा आखिरी ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था। स्टेशन लगभग खाली था। सिर्फ एक बूढ़ा आदमी लकड़ी की बेंच पर चुपचाप बैठा हुआ था।
अर्जुन ने देखा कि बूढ़ा आदमी बार-बार अपनी पुरानी जेब घड़ी को देख रहा था। उत्सुक होकर वह उसके पास गया और बोला,
“बाबा, क्या आप किसी का इंतज़ार कर रहे हैं?”
बूढ़ा आदमी हल्का मुस्कुराया और बोला,
“हाँ… मैं अपने बेटे का इंतज़ार कर रहा हूँ।”
अर्जुन ने पूछा,
“वो आने वाला है?”
बूढ़े आदमी की आँखें दूर कहीं खो गईं।
“बीस साल पहले घर छोड़कर चला गया था। जाते समय उसने कहा था कि एक दिन आखिरी ट्रेन से वापस ज़रूर आएगा।”
यह सुनकर अर्जुन चुप हो गया। बाहर बारिश और तेज़ हो गई थी। आसमान में बिजली चमक रही थी।
तभी स्टेशन पर अनाउंसमेंट हुआ—
“यात्रियों कृपया ध्यान दें, आखिरी ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर आ रही है।”
धीरे-धीरे ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी। लोग उतरने लगे। बूढ़े आदमी की आँखें हर चेहरे को ध्यान से देख रही थीं।
तभी ट्रेन के दरवाज़े से लगभग तीस साल का एक आदमी उतरा। उसके हाथ में पुराना बैग था और चेहरा थका हुआ लग रहा था। जैसे ही उसकी नज़र बूढ़े आदमी पर पड़ी, उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
“पिताजी…”
बूढ़ा आदमी कुछ पल के लिए स्थिर रह गया, फिर उसने अपने बेटे को कसकर गले लगा लिया।
अर्जुन यह सब चुपचाप देख रहा था। उस रात उसे समझ आया कि कुछ लोग सिर्फ ट्रेनों का इंतज़ार नहीं करते…
वे दूसरी मौकों का इंतज़ार करते हैं।
उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—
> “कुछ इंतज़ार मंज़िल के लिए नहीं होते,
> बल्कि अपनों के लौट आने के लिए होते हैं…”