मैं तुमसे क्यों डरूं? ✨
है तुम्हारे पास दौलत , शोहरत ज्यादा, और ज्यादा अहंकार भी,
पर मैं भी अस्तित्वहीन नहीं हूँ , फिर मैं क्यों डरूं?
डरो तुम क्योंकि विकास के आड़े विनाश किया तुमने,
डरो तुम क्योंकि झूठे वादे के आड़े लूट की तुमने।
तुम ऐसे अग्यानी हो कि तुम्हे अपनी अज्ञानता का भी भान नहीं,
तुम्हे अपनी झूठी बकवास के सामने सच्चाई का भी भान नहीं।
तुम बन बैठें हो उन चन्द लोगों में बादशाह,
तुमने चला लिया है उन्हें अपने चंद कदमों पर,
तुम ये भ्रम पाल बैठे हो कि अब दुनिया चले तुम्हारे कदमों पर।
झुकाया होगा तुमने, और झुके भी होगे लोग,
लूटा होगा तुमने, और लुटे भी होगे लोग।
पर ये चाल तुम्हारी ज्यादा न चल सकेगी,
समय बदलेगा झुके को उठाएगा, लुटेरों को सबक सिखाएगा।
तुम कर लो अपनी मनमानियां पर तुम मुझसे इज्जत न पा सकोगे,
तुम कर लो जितना जुल्म कर सकते हो पर मुझे न झुका सकोगे।
रहना,खाना तुमने सब छीन लिया, फिर कैसे तुमने ख़ुद को महान बना लिया,
मेरी चीत्कार दया की भीख मांगेगी नहीं, तुम सोच रहे हों बंधक बना कर अपना बना लिया।
शरीर तुमने बांध लिया क्या अब मेरा शौर्य भी बांधोगे,
वेदना से तड़पते शरीर से क्या अब इज्जत भी मांगोगे।
तुम कर लो कोशिश फिर भी न झुका पाओगे,
तुम तन को नष्ट करके भी मन को नष्ट न कर पाओगे।
बहुत कर ली तुमने अपनी मनमानी, कोई कहता हुआ ये आएगा,
मै विद्रोह करूंगा, तुमसे, ऐसी व्यवस्था से ये कहता हुआ आएगा।
लोगों में फिर से विश्वास जन्म लेगा सत्य के लिए,
लोगों में फिर से विद्रोह जन्म लेगा असत्य के लिए।
चिर काल तक यही गूंज गूंजती रहेगी,
क्षणिक लोगों की पुकार सत्य के लिए गूंजती रहेगी।
युद्धस्व ! युद्धस्व ! युद्धस्व !
~ यथार्थ