ऋगुवेद सूक्ति-(34) की व्याख्या
"देवो देवनामसि"
ऋग्वेद- 1-14-13
अर्थ--हे प्रभु ! तू देवों का देव है।
विस्तृत भावार्थ :
इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वोच्चता बताई गई है। संसार में जो भी देवता (प्रकाश देने वाले, शक्तियाँ देने वाले) माने जाते हैं—उन सबका मूल कारण और अधिपति परमेश्वर ही है। वही सबको शक्ति, तेज और सामर्थ्य देता है। इसलिए वह देवों का भी देव है।
शब्दार्थ :
देवः — प्रकाशमान, दैवी शक्ति वाला
देवानाम् — देवताओं का
असि — तू है
भाव :
परमेश्वर ही सभी दैवी शक्तियों का मूल स्रोत है और उसी से सब देवताओं की शक्ति प्रकट होती है।
वेदों में प्रमाण---
१. ऋग्वेद
मन्त्र :
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे
भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
— ऋग्वेद १०.१२१.१
अर्थ :
सृष्टि के प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (परमात्मा) ही था। वही समस्त प्राणियों का एकमात्र स्वामी था। उसी ने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हम उस परम देव की उपासना करें।
२. ऋग्वेद
मन्त्र :
महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥
— ऋग्वेद ३.५५.१
अर्थ :
समस्त देवताओं की महान शक्ति वास्तव में एक ही परम सत्ता से आती है।
३. यजुर्वेद
मन्त्र :
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥
— यजुर्वेद ३२.१
अर्थ :
वही परमात्मा अग्नि है, वही आदित्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है; वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है।
४. यजुर्वेद
न तस्य प्रतिमा अस्ति
यस्य नाम महद्यशः॥
— यजुर्वेद ३२.३
अर्थ :
उस परमेश्वर की कोई प्रतिमा या समान नहीं है, जिसका नाम महान और यशस्वी है।
५. ऋग्वेद
मन्त्र :
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः
अथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति
अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥
— ऋग्वेद १.१६४.४६
अर्थ :
ज्ञानी लोग एक ही परम सत्य को अनेक नामों से पुकारते हैं — कोई उसे इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि कहते हैं।
सार--
इन वेद मन्त्रों से स्पष्ट होता है कि एक ही परमात्मा सभी देवताओं का मूल कारण, स्वामी और शक्ति का स्रोत है। इसी कारण उसे देवों का देव कहा जाता है।
उपनिषदो में प्रमाण--
(1) यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद ३.४
अर्थ :
जो समस्त देवताओं का कारण और उत्पत्ति का स्रोत है, जो सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है — वही परमेश्वर है। वही पहले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है और वह हमें शुभ बुद्धि प्रदान करे।
(२) न तस्य कार्यं करणं च विद्यते
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद ६.८
अर्थ :
उस परमेश्वर का कोई कार्य करने वाला अंग या साधन नहीं है और न ही उसके समान या उससे बढ़कर कोई है। उसकी अनेक दिव्य शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं।
(३) ईशावास्यमिदं सर्वं
यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
— ईशोपनिषद-- १
अर्थ :
इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है वह सब परमेश्वर से व्याप्त है। इसलिए त्याग की भावना से इसका उपयोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।
(४) यः सर्वज्ञः सर्वविद्
यस्य ज्ञानमयं तपः।
तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥
— मुण्डक उपनिषद १.१.९
अर्थ :
जो सर्वज्ञ और सब कुछ जानने वाला है, जिसकी तपशक्ति ज्ञानमय है — उसी परम ब्रह्म से यह सम्पूर्ण जगत, नाम और रूप उत्पन्न होते हैं।
(५) एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद ६.११
अर्थ :
एक ही परम देव सब प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित है। वह सबमें व्याप्त, सबका अन्तर्यामी, सब कर्मों का अध्यक्ष, सबका आधार, साक्षी और चेतन है।
(६)नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान्॥
— कठ उपनिषद २.२.१३
अर्थ :
वह परमात्मा नित्य वस्तुओं में नित्य है, चेतन प्राणियों में सर्वोच्च चेतन है और वही एक परमेश्वर अनेक प्राणियों की आवश्यकताओं को पूर्ण करता है।
(७) सर्वं खल्विदं ब्रह्म॥
— छान्दोग्य उपनिषद ३.१४.१
अर्थ :
यह सम्पूर्ण जगत वास्तव में ब्रह्म (परमात्मा) ही है।
(८) यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते
येन जातानि जीवन्ति
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति
तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म॥
— तैत्तिरीय उपनिषद ३.१
अर्थ :
जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं और अंत में जिसमें विलीन हो जाते हैं — उसी को जानने का प्रयत्न करो; वही ब्रह्म है।
(९) तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद ३.८
अर्थ :
केवल उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु से पार हो सकता है; मुक्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है।
सार--
इन उपनिषद मन्त्रों से स्पष्ट होता है कि एक ही परमात्मा सबका आधार, अन्तर्यामी और सर्वोच्च देव है — अर्थात वही देवों का देव है।
पुराणों में प्रमाण--
(१) अहमेवासमेवाग्रे
नान्यद्यत्सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च
योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
— श्रीमद्भागवत महापुराण २.९.३३
अर्थ :
सृष्टि के प्रारम्भ में केवल मैं ही था, मेरे अतिरिक्त कोई भी सत् या असत् नहीं था। सृष्टि के बाद भी मैं ही हूँ और अंत में जो शेष रहेगा वह भी मैं ही हूँ।
(२) नारायणाद्ब्रह्मा जायते
नारायणाद्रुद्रो जायते।
नारायणादिन्द्रो जायते
नारायणात्प्रजापतिः॥
— नारायणीय उपाख्यान (शान्ति पर्व)
अर्थ :
नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, नारायण से रुद्र उत्पन्न होते हैं, नारायण से इन्द्र और प्रजापति उत्पन्न होते हैं।
(३) यन्नाभिपद्मादभवन्महात्मा
प्रजापतिर्विश्वसृजां पतिः।
— वायु पुराण
अर्थ :
जिस परमात्मा की नाभि के कमल से प्रजापति ब्रह्मा प्रकट हुए, वही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण है।
(४) यः कारणं कारणानां
सर्वेषां परमेश्वरः।
स एव देवदेवेशः
सर्वलोकनमस्कृतः॥
— लिंग पुराण
अर्थ :
जो सभी कारणों का कारण और समस्त जगत का परमेश्वर है, वही देवों का देव और सब लोकों द्वारा पूजनीय है।
(५) देवदेव जगन्नाथ
लोकनाथ नमोऽस्तु ते।
— स्कन्द पुराण
अर्थ :
हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी और लोकों के नाथ! आपको नमस्कार है।
भगवद्गीता से प्रमाण--
(१) अहं सर्वस्य प्रभवो
मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां
बुधा भावसमन्विताः॥
— भगवद्गीता १०.८
अर्थ :
मैं ही समस्त जगत का मूल कारण हूँ, मुझसे ही सब कुछ उत्पन्न और संचालित होता है। यह जानकर ज्ञानी लोग श्रद्धा से मेरी भक्ति करते हैं।
(२) परं ब्रह्म परं धाम
पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यम्
आदिदेवं अजं विभुम्॥
— भगवद्गीता १०.१२
अर्थ :
आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। आप शाश्वत दिव्य पुरुष, आदि देव और अजन्मा हैं।
(३) देवानां अस्मि वासवः॥
— भगवद्गीता १०.२२
अर्थ :
देवताओं में मैं इन्द्र हूँ (अर्थात् देवताओं की श्रेष्ठ शक्तियों का मूल भी मैं ही हूँ)।
(४) यो यो यां यां तनुं भक्तः
श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां
तामेव विदधाम्यहम्॥
— भगवद्गीता ७.२१
अर्थ :
जो भक्त जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, उसकी श्रद्धा को स्थिर भी मैं ही करता हूँ।
(५) येऽप्यन्यदेवताभक्ता
यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय
यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥
— भगवद्गीता ९.२३
अर्थ :
हे अर्जुन! जो लोग अन्य देवताओं की श्रद्धा से पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं, यद्यपि विधि के अनुसार नहीं।
सार--
भगवद्गीता के इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि परमात्मा ही सभी देवताओं का मूल कारण, आधार और सर्वोच्च सत्ता है — इसलिए
उसे देवों का देव कहा गया है।
महाभारत में प्रमाण--
१. नारायणं नमस्कृत्य
नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव
ततो जयमुदीरयेत्॥
— महाभारत (आदि पर्व १.१)
अर्थ :
नारायण, श्रेष्ठ पुरुष नर और देवी सरस्वती को नमस्कार करके ही महाभारत का वर्णन आरम्भ करना चाहिए।
(२) नारायणः परो देवः
नारायणः परं ब्रह्म।
नारायणः परो धाता
नारायणः परं तपः॥
— महाभारत (शान्ति पर्व, नारायणीय उपाख्यान)
अर्थ :
नारायण ही परम देव हैं, वही परम ब्रह्म हैं, वही जगत के धारण करने वाले हैं और वही परम तप हैं।
(३) यतः प्रवृत्तिर्भूतानां
येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य
सिद्धिं विन्दति मानवः॥
— महाभारत (शान्ति पर्व)
अर्थ :
जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, उसी परमात्मा की अपने कर्मों द्वारा उपासना करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
(४) देवदेव जगन्नाथ
लोकनाथ नमोऽस्तु ते।
— महाभारत (अनुशासन पर्व, स्तुति प्रसंग)
अर्थ :
हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी और लोकों के नाथ! आपको नमस्कार है।
(५) यस्य स्मरणमात्रेण
पापं नश्यति तत्क्षणात्।
तं नमामि जगन्नाथं
देवदेवं सनातनम्॥
— महाभारत (स्तुति प्रसंग)
अर्थ :
जिसके स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं, उस सनातन देवों के देव जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।
सार--
महाभारत में भी स्पष्ट बताया गया है कि परमात्मा ही ब्रह्मा, इन्द्र आदि सभी देवताओं के मूल कारण और सर्वोच्च स्वामी हैं, इसलिए उन्हें देवदेव (देवों का देव) कहा गया है“देवो देवानामसि” (परमात्मा देवों का देव है) ।
स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण--
१--यत्प्रसादादिमं लोकं
भुङ्क्ते सर्वं चराचरम्।
तं नमामि जगन्नाथं
देवदेवं सनातनम्॥
— पराशर स्मृति
अर्थ :
जिस परमेश्वर की कृपा से यह सम्पूर्ण चर-अचर जगत स्थित और संचालित होता है, उस सनातन देवों के देव जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।
२.--स एव सर्वभूतानां
कर्ता धाता सनातनः।
स एव देवदेवेशः
सर्वलोकनमस्कृतः॥
— याज्ञवल्क्य स्मृति
अर्थ :
वही परमेश्वर सब प्राणियों का कर्ता और पालन करने वाला सनातन स्वामी है। वही देवों का देव है और सभी लोकों द्वारा पूजित है।
३--एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सनातनः।
तं नमामि जगन्नाथं
देवदेवं महेश्वरम्॥
— दक्ष स्मृति
अर्थ :
एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है, वही सर्वव्यापी और सनातन है। उस देवों के देव महेश्वर को नमस्कार है।
४--यस्याज्ञया जगत्सर्वं
वर्तते सचराचरम्।
स देवः परमेशानो
देवानां परमः प्रभुः॥
— अत्रि स्मृति
अर्थ :
जिसकी आज्ञा से सम्पूर्ण चर-अचर जगत चलता है, वही परमेश्वर देवताओं का भी सर्वोच्च स्वामी है।
सार---
स्मृति-ग्रन्थों में भी स्पष्ट बताया गया है कि परमात्मा ही सभी देवताओं का मूल कारण और स्वामी है, इसलिए उसे देवदेव (देवों का देव) कहा गया है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
१. चाणक्य नीति
न देवो विद्यते काष्ठे
न पाषाणे न मृन्मये।
भावे हि विद्यते देवः
तस्माद्भावो हि कारणम्॥
— चाणक्य नीति
अर्थ :
ईश्वर लकड़ी, पत्थर या मिट्टी में नहीं होता; वह सच्चे भाव में निवास करता है। इसलिए भावना ही मुख्य कारण है।
२. भर्तृहरि नीति शतक
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे॥
— नीतिशतक
अर्थ :
जो दिशा, काल आदि से रहित, अनन्त और शुद्ध चेतन स्वरूप है तथा जिसे आत्मानुभूति से जाना जाता है — उस शान्त और तेजस्वी परमात्मा को नमस्कार है।
३. विदुर नीति
एकः सृष्टिमिमां सर्वां
देवदेवः सनातनः।
स एव सर्वभूतानां
हृद्देशे तिष्ठति प्रभुः॥
— महाभारत (विदुर नीति, उद्योग पर्व)
अर्थ :
एक ही सनातन देवों का देव इस सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है और वही सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
सार---
चाणक्य, भर्तृहरि, विदुर आदि आचार्यों के ग्रन्थों में भी यह सिद्ध होता है कि एक ही परमेश्वर सर्वोच्च सत्ता है और वही देवों का देव है।
“देवो देवानामसि” (परमात्मा देवों का देव है) — इस भाव का समर्थन अन्य आर्ष ग्रन्थों जैसे रामायण, गर्ग संहिता, हितोपदेश, पंचतंत्र, योगवाशिष्ठ आदि में भी मिलता है। कुछ प्रमाण श्लोक, ग्रन्थ और अर्थ सहित इस प्रकार हैं —
१. वाल्मीकि रामायण--
नमस्ते देवदेवेश
जगन्नाथ नमोऽस्तु ते।
त्रैलोक्यनाथ सर्वेश
प्रसीद मम सुव्रत॥
— वाल्मीकि रामायण (युद्धकाण्ड)
अर्थ :
हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी! आपको नमस्कार है। हे तीनों लोकों के नाथ और सर्वेश्वर! मुझ पर प्रसन्न हों।
२. गर्ग संहिता
देवदेव जगन्नाथ
भक्तानुग्रहकारक।
त्वमेव सर्वलोकानां
नाथो देवः सनातनः॥
— गर्ग संहिता
अर्थ :
हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी! आप भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हैं। आप ही सभी लोकों के सनातन स्वामी हैं।
३. हितोपदेश
नारायणं नमस्कृत्य
नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव
ततो जयमुदीरयेत्॥
— हितोपदेश
अर्थ :
नारायण, श्रेष्ठ पुरुष और देवी सरस्वती को नमस्कार करके ही कार्य का आरम्भ करना चाहिए।
४. पंचतंत्र--
यस्य स्मरणमात्रेण
विघ्नाः नश्यन्ति तत्क्षणात्।
तं नमामि जगन्नाथं
देवदेवं सनातनम्॥
— पंचतंत्र
अर्थ :
जिसके स्मरण मात्र से विघ्न नष्ट हो जाते हैं, उस सनातन देवों के देव जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।
५. योगवाशिष्ठ--
एको देवः सर्वभूतेषु
चेतनरूपेण संस्थितः।
तमेव शरणं यान्ति
ज्ञानी मोक्षपरायणाः॥
— योगवासिष्ठ
अर्थ :
एक ही परम देव सभी प्राणियों में चेतना के रूप में स्थित है। मोक्ष की इच्छा रखने वाले ज्ञानी उसी की शरण लेते हैं।
सार-----
रामायण, गर्ग संहिता, हितोपदेश, पंचतंत्र और योगवाशिष्ठ आदि ग्रन्थों में भी यह सिद्ध होता है कि एक ही परमात्मा सबका स्वामी है और वही देवों का देव है।
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