Hindi Quote in Poem by kunal kumar

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निर्वासित देवता
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सड़क के उस पार से रोज़
एक माँग उठती थी,
धीमी पर लगातार,
जैसे भूख
भाषा सीख रही हो।

मैं जानता था यह कोई भ्रम नहीं,
यह ज़रूरत है।
फिर भी मैंने आँखें मूँद लीं,
तालू काट लिए और उसे
डर, अँधेरा, षड्यंत्र कहकर
आगे बढ़ गया।

मैं कायर नहीं था
होता
तो शायद रुक भी जाता पर
मैं सुविधाजनक था।
और सुविधाजनक होना
एक भ्रामक मोतियाबिंद है
काला मोतियाबिंद,
जिसमें लोग खो देते हैं
अपनी संपूर्ण दृष्टि।
और इस तरह
किसी और की
नोची गई आँखें
मेरे अँधेपन से
कम महत्त्वपूर्ण लगने लगीं।

वैसे
सड़क के उस पार जाता
तो ज़िम्मेदारी दिखती।
और ज़िम्मेदारी से
मैं हमेशा बहुत सभ्य तरीक़ों से बचता आया हूँ।

अब उस तरफ़ से
कुछ नहीं उठता
न कोई माँग,
न कोई चीख,
सिवाय एक सड़ी-गली टीस के।
टीस,
जिसमें दर्ज है
उस दिन की उम्मीद—
मेरे आने की,
बचा लेने की।

ख़ैर,
वह मर चुकी है,
और उसके बदले
वह एक गंध हो गई ।
एक ऐसी गंध
जो कसाईखानों में,
वैश्याओं के मोहल्लों में
सामान्य हो जाती है।

यह गंध
पाप की नहीं,
उपेक्षा की है
और उपेक्षा
मेरे द्वारा की गई सबसे घिनोना कृत है ।

शायद इसलिए मैं हुआ सबकुछ
भाई , दोस्त , प्रेमी , पुत्र लेकिन
अंदर से रहा केवल
एक निर्वासित देवता ।

Hindi Poem by kunal kumar : 112017139
New bites

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