गुनगुनी धूप
गुनगुनी धूप में
जब कदम सूखे पत्तों से बातें करते हैं,
और ठंडी हवा
मन की परतों को धीरे-धीरे खोलती है,
दूर कहीं
बल खाती पतली सी पगडंडी
जैसे समय का मौन संकेत हो—
न जल्दी, न ठहराव, बस गति।
तब सोचता हूँ,
यदि पंच तत्वों का यह सरल मिलन ही जीवन है,
मिट्टी में विश्वास,
जल में धैर्य,
अग्नि में ऊर्जा,
वायु में स्वतंत्रता
और आकाश में शून्य का विस्तार—
तो फिर
इन दुनियाभर के झंझटों का बोझ क्यों?
क्यों इच्छाओं की गठरी
कंधों पर टांगे फिरते हैं हम?
शायद
हमने प्रकृति से नहीं,
अपने ही बनाए भ्रमों से समझौता कर लिया है।
पगडंडी तो आज भी वहीं है,
बस हम
उसे छोड़कर
चौड़ी सड़कों की भीड़ में
खो गए हैं।