जो लिखते हैं कड़वा सा,
कभी तो उनका हृदय भी नाज़ुक रहा होगा,
किसी अधूरी उम्मीद ने
शायद उन्हें यूँ सख़्त बनाया होगा।
शब्दों में भले चुभन हो उनकी,
पर भीतर कहीं कोई कोमल कोना होगा,
जिसने हर बार टूटकर भी
ख़ामोशी से खुद को जोड़ा होगा।
हर तीखी बात के पीछे
एक अनकहा सा डर छुपा होगा
और हर कठोर मुस्कान में
कोई पुराना दर्द सोया होगा
शायद वो भी कभी
मासूम सपनों में खोए होंगे,
किसी की बातों पर हँसे होंगे,
किसी के लिए रोए होंगे।
उसने भी चाहा होगा कभी
बिना डर के मुस्कुराना,
पर वक़्त ने सिखा दिया होगा
हर एहसास को दिल में छुपाना।
कड़वाहट अक्सर सच नहीं होती,
वो तो बस एक परत होती है,
अंदर कहीं गहराई में
एक नर्म सी चाहत सोती है।