चौपाई
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दिखे भव्यता, लुप्त सभ्यता।
किस मतलब की आज भव्यता।।
दौरे स्वारथ सजी जिंदगी।
होती देखी बहुत बंदगी।।
माना नाम बड़ा है तेरा।
लगता कहाँ किसी का फेरा।।
धन वैभव का दंभ न कीजै।
पहले ईश परीक्षा दीजै।।
अपने होते दुश्मन पहले।
बाजी मारें नहले -दहले।।
अपना किसको अब हम मानें।
दुश्मन को कैसे पहचानें।।
रुकना तेरा काम नहीं है।
सब कुछ बस आराम नहीं है।।
पहन चले सुंदर परिधाना।
मुदित भये मंगल गुण गाना।।
सकल मनोरथ पूरण सारे।
शीश झुके जब प्रभु के द्वारे।।
मातु पिता अरु गुरु के चरना।
मस्तक सदा झुकाए रखना।।
मान कौन अब किस को देता।
छीन-झपट अपना कर लेता।।
मातु पिता अब बैरी लगते।
पूत आज पहले हैं ठगते।।
जाने कैसी चली हवाएं।
जीवन पथ की नव बाधाएं।।
बीमारी से मुश्किल आए।
दर्द सभी का बढ़ता जाए।।
संसद गरिमा धूमिल होती।
सिसक-सिसक मर्यादा रोती।।
निज कर्तव्य भूलते नेता।
अलग नाव अपनी है खेता।।
हमने चुनकर संसद भेजा।
काम किया क्या हमने बेजा।।
शर्म नहीं तुमको है आती।
भूल रहे पुरखों की थाती।।
आओ नाहक गाना गाएं।
बैठे ठाले समय बिताएं।।
प्रभु लीला का लाभ उठाएं।
जो करना उसको बिसराएं।।
शासन सत्ता से भी डरिए।
उल्टे सीधे काम न करिए।।
डर दहशत तुम मत फैलाओ।
सोचो समझो मत भरमाओ।।
हमने जीना सीख लिया है।
मदिरा हमने पान किया है।।
क्या कोई अपराध किया है।
या फिर दीपक बुझा दिया है।।
हमको तो खुश रहकर जीना।
निंदा नफरत रस क्यों पीना।।
आपस में काहे टकराना।
मिलता क्या कोई शुकराना।।
आज सुबह जब धरती डोली।
बंद हुई हम सबकी बोली।।
समझ लीजिए इसकी लीला।
रंग बिरंगा नीला-पीला।।
काम नहीं तुम ऐसा करना।
कभी पड़े जो तुमको डरना।।
नहीं हमें है डरकर जीना।
प्रेम भाव रस मीठा पीना।।
कर्म- धर्म की करिए पूजा।
श्रेष्ठ नहीं कुछ इससे दूजा।।
सुखद भाव का बोध कराओ।
हीन भावना मन मत लाओ।।
आओ खेलें खेल नया हम।
वैसे भी क्या हमको है ग़म।।
चिंता है तो खूब पियो रम।
रोके-टोके किसमें है दम।।
खेल नया आओ हम खेलें।
अपने सारे ग़म को भूलें।।
समय बिताएं जमकर सोके।
किसमें दम है रोके-टोके।।
आज समय ने खेल दिखाया।
समझ नहीं कुछ हमको आया।।
मैंने उससे माँगी माफी।
बोला समय यही है काफी।।
साथ नहीं कोई अब देता।
बनते केवल सब हैं नेता।।
निज चरित्र अपना दिखलाते।
केवल जनता को भरमाते।।
सुधीर श्रीवास्तव