मुझे प्रेम है अपने देश से,
पर सुविधा की चादर ओढ़े,
कर्तव्य की ठंड से काँपता हूँ,
प्रोफाइल में तिरंगा सजाता हूँ,
पर
ज़मीनी सच से आँखे चुराता हूँ।
मुझे प्रेम है अपने देश से,
पर भूखा बच्चा जब राह में रोता है,
सिस्टम का दोष बताकर
मैं चैन की नींद फिर सोता हूं
जाति, धर्म, भाषा के नाम पर,
मैं दीवारें ऊँची खड़ी करता हूँ,
उसी मलबे पर चढ़कर फिर,
देशभक्ति की हुंकार भरता हूँ।
कहता हूँ बदलाव चाहिए,
पर खुद बदलने से घबराता हूँ,
उँगली हमेशा औरों पर उठाता हूँ,
आईना देखने से कतराता हूँ।
शोर में सच को दबा देता हूँ,
भीड़ के साथ बह जाता हूँ,
गलत जब ताक़त बन जाए,
मैं चुप्पी को समझदारी बताता हूँ।
देश मेरा सपना नहीं,
सिर्फ़ बहस का विषय बन जाता है,
कुर्सी, सत्ता, स्वार्थ की आग में
हर आदर्श जल जाता है।
पर शायद अब भी वक़्त है,
इस नींद से जाग जाने का,
देश नहीं बदलेगा नारों से,
खुद को बेहतर बनाने का।
जब ईमान मेरी आदत बने,
संवेदना मेरी पहचान बने,
तभी कह सकूँगा गर्व से —
हाँ, मुझे सच में अपने देश से प्रेम है।