शब्द-संवाद
ये शब्द ही हैं जो घाव देते, ये शब्द ही मरहम बनते हैं,
कभी ये आँखों के आँसू, कभी हंसी का संगम बनते हैं।
जब क्रोध की 'लड़ी' में पिरोकर, ये ज़ुबान से झड़ते हैं,
तब अपनों से ही अपनों के, भीषण युद्ध छिड़ते हैं।
जब तड़-तड़ करती बोली से, मर्यादा की सीमा टूटती है,
तब रिश्तों की नाजुक डोरी, पल भर में ही छूटती है।
शोर बहुत है इन शब्दों में, जो कानों को फाड़ देते हैं,
बने-बनाए जीवन को भी, ये तिनका-तिनका उजाड़ देते हैं।
पर यही शब्द जब प्रेम में ढलकर, हो जाते हैं 'फुलझड़ी',
तब अंधियारे जीवन में भी, जगमगाती है खुशियों की घड़ी।
ये शोर नहीं करते दिल में, बस धीमी चमक बिखेरते हैं,
भटके हुए राही के चेहरे, मधुरता से फेरते हैं।
फिजा बदलती, महक उठती, जब वाणी में मिठास आती है,
शब्दों की कोमल झिलमिल, मन का हर कोना हर्षाती है।
चुन लो तुम भी, तुम्हें क्या बनना—विस्फोटक या प्रकाश,
शब्दों से ही पाताल मिले, और शब्दों से ही आकाश।
Adv. आशीष जैन
7055301422