जय हिंद
युद्ध शुरू होते ही पहले,
मानवता को मार दिया जाता है।
वर्दी पहना सैनिक
दौड़ता है सामने खड़े
दूसरी वर्दी पहने सैनिक की ओर,
और उसी पल
माँओं की गोद सूनी होने लगती है।
गोलियों की चीख से
रणभूमि में
धीरे-धीरे कब्रों की कतार लग जाती है।
बंदूक से निकली गोली
किसी सैनिक के भीतर उतरने से पहले
उसके परिवार की तस्वीरों को
चीरती हुई गुजरती है।
वर्दी पहने
दोनों तरफ़ के सैनिक
अपने-अपने सपनों को जिंदा जलाकर
एक-दूसरे का सीना छलनी कर देते हैं।
फिर होती है कब्रों की गिनती,
और अंत में
उसी कब्र पर झंडा लहरा दिया जाता है।
खून से भीगी इस मिट्टी की कलम से
काग़ज़ों पर
नक़्शे बदल दिए जाते हैं।
दोनों तरफ़ की सरहदों पर
सैकड़ों लाशें बिछी होती हैं,
लेकिन सरहद के पार
सिर्फ़ जीत का जश्न मनाया जाता है।
जमीं के इस टुकड़े की लड़ाई में
लाशों की गिनती होती है,
जीत के नारे लगते हैं—
पर कोई नहीं पूछता,
क्या ये युद्ध रोका जा सकता था?