અજાણ્યો પત્ર - 26
रात के ठीक 12 बजे की वो घड़ी थी, जब मेरे सीने से बस एक ही आवाज़ बार-बार गूंज रही थी। दीवार पर टंगा आईना खामोशी से मुझ पर ताक रहा था और कमरा किसी श्मशान घाट में बदल चुका था। बाहर बारिश मेरे आँसुओं से मिलने को तरस रही थी और आख़िरकार मेरी धड़कन उसी पल रुक गई, जब उसने आख़िरी बार मेरा नाम लेकर कहा की“मुझे तुमसे मोहब्बत नहीं है, मैं किसी और से प्यार करती हूँ और तुम जानते हो वो कौन है…” बस उसी वक्त मैंने फोन रख दिया....फोन को खुद से दूर किया...पर उनकी आवाज़ अब भी मेरे कानों में गूंज रही थी! मैं निशब्द हो गया... भीतर जो शोर था वो शांत हो गया...धड़कन अब रुकने को बेताब थी और अंत में मैंने धड़कन की सुन ही ली।