मुझे हर किसी ने reject किया—
बालकनी में खड़ी परी-सी कोई लड़की हो,
या दूरी ओढ़े किसी शहर में बसी कोई लड़की,
चार साल का पुराना प्यार हो,
या पहला-पहला इश्क़,
हाथों से बंधे धागे हों,
या उन्हीं हाथों की किस्मत की लकीरें,
कहीं ऑफिस में बैठा HR हो,
या अपना कहने वाला परिवार,
लेकिन मैं इन सबसे हटने वाला नहीं हूँ,
क्योंकि यही rejection
मुझे खुद को सोचने पर मजबूर करता है—
और यक़ीन है,
ये ठोकरें आज भले चुभती हों,
पर एक दिन
मेरी चाल का भरोसा बनेंगी,
और तब
मैं इन्हीं सारे rejection पर
बिना कड़वाहट के
मुस्कुराऊँगा।
- Nilesh Tank