"गुजरा साल"
मैं कभी नववर्ष नहीं मनाती,
मुझे जाते हुए साल से लगाव हो जाता है।पूरा वक़्त मेरे साथ चला,
मेरी साँसों की रफ़्तार समझता रहा,
वो कोई तारीख़ नहीं था
एक साथी था, जो बिना शोर विदा हो गया।
हम यूँ ही नहीं टूटते,
हम साथ खोते हैं
कुछ लोग, कुछ मौसम,
कुछ पूरे-पूरे साल।
सब चले जाते हैं,
और हम भीतर ही भीतर उन्हें जीते रहते हैं।
दुनिया कहती है
यही नियम है, यही दस्तूर।
मैं इसे बदल नहीं सकती,
मगर अपने दिल के लिए क़ायदे बना सकती हूँ।
कि जो चला जाए, उसे बेवजह न भूलूँ,
और जो आए, उससे तुरंत उम्मीद न बाँधूँ।
मैं नए साल का जश्न नहीं,
पुराने साल की विदाई करती हूँ
धीमे लफ़्ज़ों में,
कृतज्ञता के साथ,
क्योंकि हर बीतता साल
मुझे थोड़ा और इंसान बनाकर जाता है।