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पानी बहता जाए, घबराए नहीं, नदी के पार भी उम्मीदें सही। - Nisha ankahi
इतने सलीक़े से उसे अलग किया गया, कि कहा जा सके वो कभी उसका हिस्सा थी ही नहीं। - Nisha ankahi
लगाव (औरत की ज़बान में) लगाव औरत के हिस्से अक्सर विरासत की तरह आता है ना माँगने की आज़ादी, ना छोड़ने की छूट। हमने जिसे प्रेम कहा, वह अक्सर समझौते की एक लम्बी परछाईं था जहाँ चाहत धीरे-धीरे कर्तव्य में बदल दी गई। लगाव ने मुझसे मेरा समय लिया, मेरी देह की थकान, मेरे मौन की मेहनत और बदले में मुझे समझदार कहलाने का तमगा दिया। जब मैंने सवाल किया, कहा गया “ज़्यादा मत सोचो, तुम जुड़ी हुई हो।” जुड़ाव यहाँ एक खूबसूरत शब्द था मेरे हक़ काटने का। मुझे सिखाया गया कि लगाव त्याग है, पर किसी ने नहीं बताया कि त्याग की क़ीमत हमेशा औरत ही क्यों चुकाती है। आज समझ आता है लगाव अगर मेरी आवाज़ दबा दे, मेरी आकांक्षा छोटा कर दे, मेरी पहचान को किसी और के नाम पर टिका दे तो वह प्रेम नहीं, एक सलीकेदार क़ैद है। मैं अब भी जुड़ सकती हूँ, पर झुककर नहीं। मैं लगाव चुनूँगी वहाँ, जहाँ मुझे पूरा इंसान रहने दिया जाए। @निशा अनकही
जब सूर्य दिशा बदलता है, तब जीवन भी नया साहस पाए मकर संक्रांति आपके भीतर उजाले की फसल बो जाए। - Nisha ankahi
न दुआ की दरकार रही, न दवा की, जब सब्र ने मेरे भीतर घर कर लिया। - Nisha ankahi
एक मुस्कान ही माँगी थी ज़िंदगी से, बेकार मुझसे लड़ पड़ी ज़िंदगी। - Nisha ankahi
न चाहत की लहर, न उम्मीद का साया, अब बस विरक्ति है ,और गहरा सन्नाटा। - Nisha ankahi
ख़ौफ़ आता है अब हर एक दस्तक से, किसी ने दिल यूँ भी तोड़कर देखा है। - Nisha ankahi
जिस घर में उसका सम्मान रहेगा, वहीं हर आशीष का मान रहेगा। जहाँ नारी को आदर मिलेगा, वहीं सृष्टि का कल्याण रहेगा। - Nisha ankahi
मरमरी-सी धूप उतरी जब आँगन में, ठिठकी हुई उदासी भी पिघलने लगी। - Nisha ankahi
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