अब औरत अपना नसीब खुद लिखती हैं,
उसे अब पुरुष की जरूरत नहीं।
अब औरत अपना पिंजरा खुद चुनती है,
उसे अब पुरुष की बनाई कैद में रहना नहीं।
अब औरत अपने जख्मों पर मलहम खुद रखती है,
अब उसे पुरुष के हमदर्द की दरकार नहीं।
अब स्त्री चाहती है आजाद, स्त्री होने से,
शायद अब स्त्री को स्त्री की भी जरूरत नहीं।