मां की ममता
रात के सन्नाटे में जब दुनिया सो जाती है,
मां की आंखें तब भी खुली रह जाती हैं।
थकी हुई देह, कांपते हुए हाथ,
पर दिल में बस एक ही सवाल —
“बेटी ने खाना खाया या नहीं आज रात?”
वो मां... जो खुद आधा पेट रह जाती,
पर मेरी थाली में निवाला ज़्यादा रख जाती।
जिसे कभी चैन नहीं आया अपनी नींद से,
क्योंकि उसकी नींद भी मेरे ख्वाबों की कैद में थी।
जब मैं गिरती थी, तो मां की आंखें रोती थीं,
मैं दर्द से चिल्लाती थी, वो भीतर से टूटती थी।
मुझे तो बस छिल गया था घुटना,
पर उसे लगता जैसे दिल फट गया हो पूरा।
वो मेरे हर “ठीक हूं मां” को पहचान जाती थी,
आवाज़ सुनकर भी दर्द पढ़ जाती थी।
कभी शब्द नहीं, बस एक नज़र काफी होती थी,
क्योंकि मां... ममता की जुबान जानती थी।
जब मैंने पहली बार स्कूल छोड़ा,
मां ने दरवाज़े पर खड़ी रहकर हाथ हिलाया,
चेहरे पर मुस्कान थी... पर आंखों ने सब बताया,
जैसे कह रही हो —
“जा मेरी गुड़िया, पर जल्दी लौट आना।”
समय बीता... मैं बड़ी हो गई,
ख्वाबों में, ज़िम्मेदारियों में खो गई।
मां वही रही —
दरवाज़े पर अब भी इंतज़ार करती हुई,
चूल्हे की आग में यादें सेंकती हुई।
कभी फोन करती हूं तो कहती —
“खाना समय से खा लिया कर बेटी।”
पर उसके स्वर में छिपा होता है वो दर्द —
कि वो अब मेरी थाली नहीं सजाती।
एक दिन जब घर लौटी,
तो देखा — वो बिस्तर पर थी...
शरीर कमजोर, पर आंखों में वही उजाला।
मैं फूटकर रो पड़ी... कहा —
“मां, तू क्यों नहीं बोली कि तू बीमार है?”
वो मुस्कुरा दी —
“बेटी, तुझे कैसे बताती, तू तो खुद थकी थी ना।”
उसकी हथेलियां अब भी वैसी ही थीं —
खुरदरी, पर सुकून देने वाली।
मैंने उन पर सिर रख दिया,
तो लगा जैसे सारी थकान मिट गई।
कुछ दिन बाद... वो चली गई,
पर उसकी खुशबू अब भी मेरे घर में है।
उसकी चूड़ियों की खनक,
उसकी पुकार... अब भी दीवारों पर गूंजती है।
अब जब रसोई में रोटियां सेंकती हूं,
तो आटे में आंसू गिर जाते हैं।
आईने में जब खुद को देखती हूं,
तो उसकी झलक नज़र आती है —
क्योंकि शायद...
हर बेटी के चेहरे पर उसकी मां ज़िंदा रहती है।
मां...
तेरे बिना ये घर नहीं, बस एक मकान है,
तेरे बिना ये दिल नहीं, बस एक जान है।
तू थी तो हर दर्द में सुकून था,
अब तू नहीं — तो सुकून में भी एक सन्नाटा है।
“मां की ममता शब्दों में नहीं समा सकती... वो तो हर आंसू में, हर सांस में, हर याद में ज़िंदा रहती है।”