७……"जहाँ आज़ाद और मैं मिलते हैं"
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जहाँ डर की दीवारें गिरती हैं,
और साहस की हवा बहती है,
जहाँ बंदिशें टूटकर हवा में घुल जाती हैं,
और शब्दों में आग सी चमक उठती है —
वहीं,
मैं और आज़ाद एक हो जाते हैं।
हम न समय से बँधे हैं,
न देह से।
सिर्फ़ आदर्श, स्वतंत्रता और निडरता की उस धारा में
हम हमेशा मिलते हैं,
जहाँ आज़ाद और मैं मिलते हैं।
रात के सबसे शांत पहर में,
जब हवा भी सोचने लगती है —
तब कोई फुसफुसाता है मेरे भीतर,
“मत झुकना।”
वो मैं नहीं…
वो आज़ाद हैं।
जब दुनिया कहती है — “रुक जा,”
और मेरा दिल कहता है — “आगे बढ़,”
तो कहीं न कहीं
उनकी छाया मेरी साँसों में उतर आती है।
हम कभी एक-दूसरे से नहीं मिल पाएंगे,
पर जब भी मैं सच्चाई के पक्ष में खड़ा होता हूँ,
जब भी मैं किसी भय को ठुकरा देता हूँ —
मैं जानता हूँ,
वहीं कहीं,
आज़ाद मेरे कंधे पर हाथ रखे खड़े हैं।
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