मानी मैं अभिमानी ........!!
मानी मैं अभिमानी ,
तुम कहाँ सरल पिया ..!?
मैं जो न बोलूं तुमसे ,
तुम कहो कब कहे पिया ...?!
मैं जो तरसाऊं तुमको ,
तुमने भी कब दिया दरश पिया ...!?
हां .. मानी मैं अभिमानी ...!?
मैं अग्नि सी भभक उठी ,
तुम कहाँ रहे शीतल पिया ..!?
मैं बाँध ली जो मन को,
तुम कहो कब बहे पिया ..!?
मैंने जो रोके शब्दों को अधरों पर,
तुम कब नयनो से हुए स्वच्छंद पिया ..!?
मानी मैं अभिमानी ...!?
रहे तुम रोम में,
बसे तुम प्राण में ,
क्यों कहूं मैं,
तुमपर सब अर्पण पिया ...!?
हाँ… मानी मैं अभिमानी
न कहूं तुम बसे राग में ,
न कहूं तुम बसे श्वास में ,
न कहूं तुम बसे धड़कन ,
जड़ चेतन में मेरे पिया ...!!
तुम जलें दीप से तो जले ,
मैं भी तो मचली हर उथली श्याम में पिया ..!
तुम उमड़े सागर से तो उमड़े ,
मैं भी तो बंधी हर आयाम में पिया ,
बरसे तुम बूंदों से तो बरसे ,
धरती सी मैं भी तो तरसी पिया ..!!
फिर जो तुम न कहे ..
कहो मैं क्यों कहूं पिया ..!?
मानी मैं अभिमानी ....!!