"आधा चाँद"
कुछ वो अधूरे, कुछ मैं अधूरी,
वैसे ही अधूरा सा लगता ये चाँद।
उनके और मेरे इश्क़ की यादों को,
फिर से जगा जाता है ये आधा चाँद।
रात की तन्हाई में जब सब सो जाते हैं,
ख़ामोशी में मुस्कुराता है ये आधा चाँद।
जैसे उनके चाँद-से चेहरे पर नूर है,
वैसे ही हुस्न-ओ-इश्क़ से महकता ये आधा चाँद।
मेरे ख़्वाब अधूरे, कुछ अनकहे,
बादलों में छिपा सिसकता ये आधा चाँद।
विरह की आग में मैं भी जलती,
संग जलता है ये आधा चाँद।
मेरे आँसू, मेरा दर्द, मेरी पीड़ा,
सब बाँट लेता है ये आधा चाँद।
मैं भी यहीं हूँ, ये आधा चाँद भी यहीं है,
मगर ना जाने कहाँ छुप गया मेरा चाँद।
— Kirti Kashyap “एक शायरा” ✍️