"ऐ तन्हाई"
ऐ तन्हाई… आज फिर तुम आ बैठी हो ना?
बिना आवाज़, बिना दस्तक के।
तुम्हारा यूँ आ जाना अब अजीब नहीं लगता,
आदत बन गई हो तुम मेरी।
पता है, लोग कहते हैं कि मैं अकेली हूँ,
पर तुम्हारे साथ कभी ऐसा महसूस नहीं होता।
कभी लगता है तुम सुन रही हो,
जब मैं कुछ कहती भी नहीं।
कभी बस तुम्हारे होने से सुकून मिल जाता है।
कभी तुम मेरी हँसी बन जाती हो,
तो कभी बस मेरे खामोश आँसुओं का साथी।
लोग डरते हैं तुमसे,
पर मुझे तुमसे एक अजीब-सी राहत मिलती है।
शायद इसलिए… अब तुम्हारे जाने का मन नहीं करता।
तुम अजीब हो, मगर अब अपनी जैसी लगती हो।
और मुझे लगता है,
शायद मैं तुमसे ही सबसे ज़्यादा बातें करना चाहती हूँ।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️