अपना-अपना आसमान!
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घर! यह शब्द सुनते ही एक आत्मीयता का भाव मन में उतर आता है,पर घर का आकार, उसकी बनावट और उसका परिवेश हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग मायने रखता है। किसी के लिए दो कमरों का फ्लैट ही स्वर्ग है, तो किसी के लिए विशाल कोठी विरान-सी लगती है।
यथार्थ यह है कि कोई भी घर केवल ईंट, सीमेंट और दीवारों का जोड़ नहीं होता, वह मनुष्य के स्वभाव, उसकी जीवनशैली और उसकी ज़रूरतों का प्रतिबिंब होता है। कोठी में पले-बढ़े व्यक्ति को फ्लैट की सीमित दीवारें बंधन-सी प्रतीत होंगी, वहीं फ्लैट की सामूहिकता में जीने वाला व्यक्ति कोठी के विशाल आंगन में अकेलापन महसूस करेगा।
दरअसल, जीवन की हर वस्तु, हर चुनाव, हर सुख—व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित होता है। जो एक के लिए अमृत है, वही दूसरे के लिए विष हो सकता है। यही कारण है कि विवेकशील जीवन जीने का सूत्र यह है कि हम अपने स्वभाव, अपनी ज़रूरत और अपनी सुविधा को पहचानें और उसी अनुरूप चुनाव करें।
परंतु हमारे समाज की विडंबना यह है कि लोग अक्सर दूसरों की नकल में अपने जीवन की दिशा तय करते हैं। पड़ोसी ने कोठी बना ली, तो हमें भी बनानी है। मित्र ने फ्लैट लिया, तो हमें भी लेना है। परिणामस्वरूप, हम न तो उस घर में चैन से रह पाते हैं, न ही मन की शांति पा पाते हैं।
सही जीवनदृष्टि यही है कि तुलना और दिखावे के बजाय आत्मसंतोष को महत्व दें। दूसरों को नीचा दिखाना उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जितना स्वयं को हीन मानकर ग्लानि में डूबना। किसी की सफलता या सुविधा आपकी कसौटी नहीं हो सकती।
अंततः, जीवन का मर्म यही है कि हर व्यक्ति अपना-अपना आसमान ढूँढ़े—जहाँ उसकी साँसें सहज चलें, उसका मन शांति पाए, और उसका घर उसके व्यक्तित्व और जरूरत के अनुरूप हो।
आर के भोपाल।