भारत की सहिष्णुता बनाम कट्टरपंथ की विरासत!
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भारत का इतिहास केवल युद्धों और साम्राज्यों की कहानी नहीं है। यह वह भूमि है, जिसने हर संस्कृति, हर विचार और हर समुदाय को अपने भीतर जगह दी। यही कारण है कि अमीर खुसरो, रसखान, रहीम, मीर और ग़ालिब जैसे मुस्लिम कवि इस मिट्टी में जन्मे और यहाँ की भक्ति परंपरा में डूबकर अमर हुए।
रसखान ने कृष्ण के ग्वालों संग गोकुल में बसने की कामना की, रहीम ने नीति-काव्य में भक्ति का रंग घोला, खुसरो ने हिंदुस्तान की वाणी को अपनी आत्मा बनाया। इनकी रचनाएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के सह-अस्तित्व का प्रमाण हैं।
लेकिन इतिहास का दूसरा पहलू इससे बिल्कुल भिन्न है।
महमूद ग़ज़नी ने सोमनाथ मंदिर ध्वस्त कर हजारों हिंदुओं का कत्लेआम किया।
औरंगज़ेब ने काशी विश्वनाथ और मथुरा के केशवदेव मंदिर को गिराकर मस्जिदें खड़ी कर दीं।
सल्तनत और मुगल काल में असंख्य हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण हुआ।
और जब 1947 में स्वतंत्रता मिली, तो धर्म के आधार पर देश का विभाजन कर दिया गया। लाखों हिंदू और सिख मौत के घाट उतारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए।
इन सभी घटनाओं के बावजूद हिंदू समाज ने सहिष्णुता को त्यागा नहीं। उसने ग़ालिब की शायरी को अपनी आत्मा से जोड़ा, खुसरो और रसखान पर गर्व किया, रहीम को नीति-पुरुष माना। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने यहाँ तक कहा—
“इन मुसलमान हरिजनन पे कोटिन्ह हिन्दू वारिये।”
यह एक सभ्यता का आभार था, जिसने प्रताड़ना सहने के बाद भी रचनात्मकता और संवेदना का सम्मान किया।
अब सवाल है—क्या मुस्लिम समाज ने कभी तुलसी, सूर, कबीर या विवेकानंद जैसे हिंदू संतों और कवियों के लिए वैसा ही उद्गार व्यक्त किया? क्या किसी कट्टर मौलाना ने कहा कि “ऐसे हिंदू पर तो करोड़ों मुसलमान निछावर हों”?
उत्तर साफ़ है—नहीं। क्योंकि कट्टरपंथ का ढांचा स्वीकार्यता नहीं सिखाता, वह केवल अलगाव और अस्वीकार पर टिका है।
विडंबना यही है।
रसखान कहते हैं कि गोकुल के ग्वालों संग रहना ही उनके जीवन का परम सुख है।
खुसरो गाते हैं कि हिंदुस्तान की मिट्टी से बढ़कर कुछ नहीं।
लेकिन आज का कट्टरपंथ भारत माता की जय बोलने से भी कतराता है।
इतिहास गवाही देता है कि हिंदू समाज शायद दुनिया की सबसे अधिक प्रताड़ित, फिर भी सबसे अधिक सहिष्णु परंपरा है। उसने तलवार के प्रहार झेले, विभाजन का दर्द सहा, मंदिर-विनाश की चोटें सही। लेकिन इसके बावजूद उसके भीतर अब भी समावेश का स्वर गूँजता है।
यह सहिष्णुता भारत की ताक़त है। लेकिन यह प्रश्न भी अब जोर से उठ रहा है—क्या यह सहिष्णुता हमेशा एकतरफ़ा रहेगी?
क्या समय नहीं आ गया है कि मुस्लिम समाज अपने रसखान और खुसरो से प्रेरणा ले और उसी आत्मा से कहे—
“भारत माता की जय।"
आर के भोपाल।