ये कैसा इन्वेस्टिगेशन है,जिसमें,
सब-कुछ फिक्स है।
मर्डर हुआ था जिसका, आज
वही मर्डरिस्ट है।
कत्ल किया वंश में जिसने,
आज बना वो ईष्ट है।
ऐसी सोच रही तो,मिट जाना,
तेरा अभिष्ट है।
हमने जो भोगा पुर्वकाल में,
अब चुकाने किस्त है।
सोचो समझो,राह पे आओ,
पंथ तेरा निकृष्ट है।
हम सही और सभी गलत हैं,
ये कैसी तेरी दृष्टि है।
तुम कुछ करो,पर मेरे कार्यों पर
क्यों ध्यान आकृष्ट है?
जीवन है एक बंद पुस्तक पढ़ना,
पृष्ठ दर पृष्ठ हैं।
जीना जीवन,जी कर मरना सबका,
यही अभिष्ट है।
आर के भोपाल।