“उम्मीद का नया सवेरा”
ख्वाब जो आँखों में सजाए थे कभी,
अब टूटकर बिखर गए धूल में।
वक्त की आँधियों ने उजाड़ दिया,
उम्मीदों के छोटे से फूल में।
हर आहट अधूरी लगती रही,
हर चाहत अधर में रुकती रही।
कभी सोचा था जो मंज़िल मेरी है,
वो राह ही मुझसे छूटती रही।
टूटे काँच से जब दिल छलनी हुआ,
तो दर्द की बूंदें झरती गईं।
पर उस दर्द की नमी से ही,
नई चाहतें पनपती गईं।
अँधेरों ने जब चारों ओर घेरा,
तो चाँदनी का दिया जलाया मैंने।
खामोश रातों की तन्हाई में भी,
नया सपना सँजोया मैंने।
ग़म के दरिया में डूबते हुए भी,
आस का तिनका थाम लिया।
ठोकरों ने गिराया सही,
पर हर बार उठकर नाम लिया।
टूटना अंत नहीं है सफ़र का,
ये तो बस एक इम्तिहान है।
हर बिखरे टुकड़े में छुपा हुआ,
फिर से जीने का अरमान है।
तो जो ख्वाब बिखरे हैं आँखों से,
उन्हें यादों की कब्र में सो जाने दो।
नए सपनों को पंख लगाकर,
ज़िंदगी को मुस्कुराने दो।