तेरी लिखाई पढ़कर तो यही समझ आया कि पढ़ाई हर किसी को इंसान नहीं बना पाती। पढ़-लिखकर गधा बनने से अच्छा है अनपढ़ रहना, कम से कम तमीज़ तो रहती है। और भाषा सीखना काबिलियत है… और दूसरों की इज़्ज़त करना तमीज़, दोनों ही गूगल ट्रांसलेट में नहीं मिलते। और तेरे जैसी सोच के लिए गूगल ट्रांसलेट नहीं, गूगल ट्रीटमेंट चाहिए।
अच्छा हुआ तूने पोस्ट लिखी, वरना हमें पता ही नहीं चलता कि डिग्री और अक्ल में फ़र्क़ होता है। ज्ञान तो बहुत है तुम्हारे पास… बस समझ कम है। यही फर्क पढ़े-लिखे गधे और समझदार इंसान में होता है।