फिर भी हाथ बढ़ाइए!
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नदी जब बहती है तो यह नहीं सोचती कि किनारे उसे कितना संजोएंगे।
सूरज हर भोर उगता है, बिना यह हिसाब लगाए कि कौन उसकी किरणों का स्वागत करेगा और कौन परदे खींच लेगा।
पेड़ अपनी शाखों से छाया देते हैं, चाहे नीचे बैठा पथिक उन्हें पत्थर ही क्यों न मार दे।
जीवन का भी यही विधान होना चाहिए।
लोग जब मुंह मोड़ लें, नज़रें फेर लें, तब मन टूटता है।
लगता है, जिनके लिए दीपक जलाया, वही आँधी बनकर लौ बुझाने चले आए।
परंतु भूलिए मत—दीपक का मूल्य आँधी से नहीं, अंधकार से मापा जाता है।
और आपकी पहचान उन हाथों से नहीं है जो आपके विरुद्ध उठे, बल्कि उस उजाले से है जो आपने बाँटा।
अहंकार मनुष्य को अपनी ही दृष्टि में छोटा कर देता है।
जब आप किसी को सहारा देते हैं, तो कई बार वही सहारा उसे बोझ लगने लगता है।
वह सोचता है कि आप ऊँचे हो गए और वह नीचे रह गया।
और यही चोटिल अहंकार, उसी के हाथों को आपके विरुद्ध हथियार बना देता है।
आप सोचते रह जाते हैं—“मैंने तो इसका भला किया था…....., फिर क्यों?”
पर पेड़ यह नहीं सोचता कि उसकी छाया में बैठे ने धन्यवाद दिया या नहीं।
नदी यह नहीं पूछती कि उसका जल पीने वाला आभारी है या नहीं।
फिर आप क्यों पूछें?
याद रखिए—भलाई का फल तात्कालिक नहीं होता।
यह बीज की तरह है।
आज बोया गया बीज तुरंत वृक्ष नहीं बनता, पर ऋतुएँ बदलने पर वही बीज किसी बगीचे में फल-फूलकर लौट आता है।
प्रकृति सब लिखती है—हर कदम, हर आहट, हर स्पंदन।
आपकी भलाई किसी अदृश्य कोष में जमा होती जाती है।
और एक दिन, किसी और के हाथों, किसी और रूप में, वह आपको ही लौट कर आती है।
हाँ, कड़वे अनुभवों के बाद मन कहता है—अब और मदद नहीं करेंगे, अब और भरोसा नहीं करेंगे,परंतु यही तो सबसे बड़ा पराजय है।
यह वैसा ही है जैसे आकाश बादलों से ढक जाए और सूर्य तय कर ले कि अब वह उदय नहीं होगा।
क्या ऐसा संभव है? नहीं।
तो फिर आप क्यों अपनी रोशनी रोकें?
मदद करते रहिए।
क्योंकि इसी में आत्मा का सच्चा आनंद है।
इसी में मनुष्य का असली "मनुष्यत्व" छिपा है।
जीवन एक विशाल विद्यालय है।
हर धोखा, हर ठोकर, एक नई कक्षा है।
कभी किसी को दिया पैसा लौटकर नहीं आया तो समझिए कम कीमत में शिक्षा मिल गई।
कभी दोस्ती टूटी तो मानिए किसी और गहरी कैद से मुक्ति मिल गई।
सबसे कठिन बेड़ी मोह की है।
और सबसे बड़ी स्वतंत्रता उसी से छुटकारा।
जो आपके साथ नहीं चल सकते, उन्हें मुस्कान देकर विदा कर दीजिए।
क्योंकि जब राह से भीड़ हटती है, तभी मंज़िल साफ दिखाई देती है।
भलाई का मूल्य व्यक्ति से नहीं, भावना से आँका जाता है।
और ब्रह्मांड उसी भावना को प्रतिध्वनि की तरह लौटाता है—
कभी किसी अजनबी की मुस्कान में,कभी किसी अनजाने हाथ की सहायता में,
कभी किसी अप्रत्याशित सुबह की रोशनी में। इसलिए,
फिर भी हाथ बढ़ाइए!!
आर के भोपाल।