Hindi Quote in Blog by Ranjeev Kumar Jha

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सुविधा का शाप और समाधान!
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मनुष्य ने जब से सभ्यता का चोला पहना, तब से उसने अपने जीवन को आसान बनाने के लिए साधनों का आविष्कार किया।
अब प्लास्टिक से बनी पोलिथीन। यह पतली-सी थैली, जो दिखने में जितनी हल्की है, हमारे जीवन पर उतनी ही भारी पड़ रही है।

कहना कठिन है कि इसका समाधान क्या है। शहरों की सड़कें, गांव की पगडंडियां, नदियों के घाट और खेतों की मेड़ें—सब इस “सुविधा” के बोझ तले कराह रही हैं। जल स्रोत कचरे से पट चुके हैं, गली-मोहल्ले में नालियां जाम हैं, बरसात आते ही शहर झील का रूप ले लेते हैं। पशु इसे खाकर तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। खेतों की उपजाऊ मिट्टी दम तोड़ देती है। और तो और, जब विदेशी पर्यटक भारत आते हैं और हर जगह बिखरी रंग-बिरंगी थैलियां देखते हैं तो वे हमारी संस्कृति की भव्यता से पहले हमारे कचरे की दुर्गंध पहचान लेते हैं।

यह कोई क्षणिक समस्या नहीं है। पोलिथीन की आयु सैकड़ों वर्षों की है। यानी जो थैली आज सड़क किनारे फेंकी गई है, वह हमारी सातवीं पीढ़ी को भी उपहार स्वरूप मिलेगी। और यह ऐसा उपहार है जिसे कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहेगा।

लेकिन इसके दूसरे पहलू पर भी नज़र डालनी होगी। पोलिथीन दुनिया का सबसे सस्ता और सुविधाजनक पैकेजिंग मटीरियल है। दुकानदार के लिए यह राहत है, ग्राहक के लिए सुविधा। एक छोटी-सी थैली में सौदा पैक, और न कोई झंझट, न अतिरिक्त खर्च। इसीलिए आप दुकानदारों और खरीदारों से इसे छीन नहीं सकते। यह "फैशन" नहीं, "आर्थिक विवशता" है।

हम अक्सर कहते हैं—“जागरूकता से लोग बदल जाएंगे।” पर सच यही है कि महज़ जागरूकता किसी को पोलिथीन छोड़ने पर मजबूर नहीं करेगी। यह सुविधा और खर्च का मामला है। जब तक कोई ऐसा विकल्प सामने न आए जो उतना ही सस्ता और उतना ही सुविधाजनक हो, तब तक पोलिथीन की पकड़ से समाज को आज़ाद कराना मुश्किल है।

तो फिर समाधान क्या है? दोष किसे दें? सरकार को? दुकानदार को? उपभोक्ता को? दोषारोपण से कोई राह नहीं निकलेगी। यह समस्या सामूहिक है और समाधान भी सामूहिक ही होगा।

जैव-अवशोषित विकल्प: उद्योग जगत को ऐसे थैले बनाने होंगे जो मिट्टी में घुल-मिल जाएं। स्टार्च और कपास आधारित पैकेजिंग इस दिशा में उम्मीद जगाती है।

आर्थिक प्रोत्साहन: सरकार यदि कपड़े या जूट की थैलियों को सस्ता करने के लिए सब्सिडी दे, तो दुकानदार और उपभोक्ता स्वयं उनका प्रयोग करने लगेंगे।

सख़्त नीति: नियम केवल कागज पर नहीं, ज़मीन पर लागू होने चाहिए। जब दुकानदार और ग्राहक को वास्तविक जुर्माना भरना पड़ेगा, तभी व्यवहार बदलेगा।

जनभागीदारी: हर नागरिक को अपनी थैली लेकर बाज़ार जाने की आदत डालनी होगी। जैसे अतीत में घर से टोकरी या कपड़े का झोला ले जाया जाता था, वही परंपरा पुनः जीवित करनी होगी।

रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग: पहले से फैले प्लास्टिक को इकट्ठा कर सड़कों, ईंटों या फर्नीचर बनाने में इस्तेमाल करना होगा, ताकि कचरा घटे।

पोलिथीन की थैली दरअसल मनुष्य के स्वभाव का आईना है। हम सुविधा के लिए प्रकृति को दांव पर लगाने से नहीं हिचकते। किंतु प्रकृति का न्याय धीमा जरूर है, पर अटल है। यदि हमने समय रहते इस “सुविधा के शाप” का हल न खोजा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कोसेंगी—“जिन्होंने सुविधा के लिए धरती का दम घोंट दिया।”

समस्या कठिन है, पर समाधान असंभव नहीं। बस, पूरे समाज को मिलकर इस बोझिल हल्की थैली से मुक्ति का रास्ता खोजना होगा। और वह रास्ता किसी उपदेश से नहीं, बल्कि नीति, नवाचार और आदत के संगम से ही निकलेगा।

“धरती न हमारी बपौती है,
न हमारे साथ जाएगी;
हम तो बस इसके पहरेदार हैं,
जितना बचा लें उतना भविष्य का ऋण चुक जाएगा।”
आर के भोपाल

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