भारतीय संविधान! सेक्युलर से सांप्रदायिकता तक की यात्रा!
संविधान सभा ने जब हमें आज़ादी के बाद का भविष्य सौंपा, तो उसके हाथों में एक दीपक था—धर्म-निरपेक्षता का दीपक। उस दीपक की लौ यह कह रही थी कि राज्य किसी धर्म का दास नहीं होगा, न किसी मज़हब का कृपापात्र।
लेकिन कुछ ही दशकों में वह लौ टिमटिमाने लगी। और देखते ही देखते, उसका प्रकाश धुंधला पड़ गया। कारण? राज्य ने स्वयं उस दीपक पर परछाइयाँ डालनी शुरू कर दीं।
समान नागरिक संहिता की जगह मज़हबी कानूनों को ढाल बना दिया गया। एक ओर तीन तलाक़ में औरतें पीसती रहीं, दूसरी ओर संसद मौन रही।
विवाह की न्यूनतम आयु तक धर्म की दीवारें खड़ी कर दी गईं—किसी के लिए अलग, किसी के लिए और अलग।
वक़्फ़ कानूनों ने एक ऐसा साम्राज्य गढ़ लिया जहाँ सरकार का हाथ भी पहुँचने से डरने लगी।
कभी अल्पसंख्यक आयोग, कभी अल्पसंख्यक मंत्रालय, तो कभी विशेष विश्वविद्यालय—राज्य ने बार-बार अपने हाथ से अलग कक्ष बनाए और ताले उन्हीं को सौंप दिए जिनके लिए वे बने।
आरक्षण से लेकर छात्रवृत्तियों तक, हर जगह "धर्म,मजहब और समुदाय" शब्द ने "नागरिक" शब्द को निगल लिया।
शाहबानो जैसी मिसालें बताती हैं कि संसद अपने ही सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को पलटने से नहीं हिचकिचाई, अगर मज़हबी वोटबैंक नाराज़ हो।
आज न्यायालय संसद के फैसले पलटने को बेताब है।
धर्मनिरपेक्षता का वटवृक्ष आज सांप्रदायिकता की बेलों से जकड़ चुका है। संविधान, जो सबको बराबरी का वचन देता था, अब टुकड़ों-टुकड़ों में बँट चुका है।
अब सवाल यही है।
क्या यह राष्ट्र फिर कभी वास्तव में सेक्युलर हो पाएगा?
दूध से दही और मक्खन बनाना आसान है, पर दही और मक्खन से दूध बनाना असंभव।
आर के भोपाल।