अब खुद को संभालिए।
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रिश्तों की दुनिया भी बड़ी अजीब है। कोई कहे "मेरा ख़याल छोड़ दीजिए, खुद को सँभाल लीजिए" तो सामने वाले को यही लगता है कि शायद यह कोई नयी कविता की लाइन है, जिसे याद कर लेना चाहिए। जबकि हकीकत यह है कि भाईसाहब! यह कोई कविता नहीं, अंतिम चेतावनी है—"आगे रास्ता बंद है, कृपया ट्रैफिक जाम मत कीजिए।"
मोहब्बत का रोग भी अजीब है—यह ठीक वैसे ही है जैसे मोबाइल का पुराना चार्जर: काम का नहीं, पर लोग फेंकते भी नहीं। उल्टे उसे बार-बार प्लग में घुसाकर देखते रहते हैं कि शायद अब काम कर जाए। और जब सामने वाला साफ कह दे—"हुज़ूर, मैं आपकी उम्मीद से ऊपर जा चुकी हूँ," तब भी लोग दिल को समझाते रहते हैं—"नहीं, शायद वह टेस्ट ले रही है।"
अब सवाल है कि जब बंदा जा चुका है, तो आपको पत्थर क्यों उछालने चाहिए? मगर सच कहिए, यही तो हमारे समाज का प्रिय खेल है। जाने वाले पर दूर से ताना मारना, चाय की मेज़ पर उसके नाम की आहें भरना, और दोस्तों की महफ़िल में उसकी चर्चा और शिकायतें करना—ये सब पत्थरबाज़ी के ही तो नए रूप हैं।
असल में, मोहब्बत का सबसे बड़ा ड्रामा यह है कि लोग हार मानना नहीं सीखते। मान लो, सामने वाला साफ कह रहा है—"अब मुझसे दूर रहो"—फिर भी दिल वाले समझते हैं कि "ये तो प्रेम का उल्टा इज़हार है, थोड़ा और धक्का दो तो मान जाएगी।"
सच यही है कि संबंध जब साँसें तोड़ चुके हों, तब उनके पीछे भागना वैसा ही है जैसे टूटी चप्पल को बार-बार गोंद से जोड़ना। दो कदम चलो, फिर वही फिसलन। बेहतर है कि आप अपने पैरों को सँभालें, नई चप्पल ले लें, और पुरानी को राम-राम कहकर अलविदा कर दें।
तो हुज़ूर, मोहब्बत अगर राख हो चुकी हो, तो कृपया धुआँ न उठाइए। और अगर पत्थर ही उछालना है, तो किसी नए रिश्ते की नींव पर उछालिए—पुराने मकान की टूटी छत पर फेंकने से बस सिर ही फूटेगा।
बेहतर होगा कि खुदको संभालिए!!