हिंदी दिवस : चेतावनी का दिन!
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हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, यह हमारी आत्मा है। यह वही धारा है जिसमें तुलसी, कबीर, प्रेमचंद और निराला की आवाज़ें गूंजती हैं। पर विडंबना देखिए—हम अपनी ही भाषा को “हिंदी दिवस” तक सीमित कर देते हैं, जबकि अंग्रेज़ी को साल के 365 दिन सिर पर बिठाए रहते हैं।
दुनिया के देश अपनी मातृभाषा में विज्ञान, तकनीक, व्यापार सब रच रहे हैं। और हम? अपनी जड़ों को छोड़कर दूसरों की ज़ुबान पर इतराते हैं। यह सिर्फ भाषाई भूल नहीं, मानसिक गुलामी है।
हिंदी दिवस कोई औपचारिक पर्व नहीं, यह चेतावनी है—अगर हिंदी को जीवन के हर क्षेत्र में जगह नहीं देंगे, तो हम अपनी पहचान खो देंगे। अंग्रेज़ी सीखिए, दूसरी भाषाएँ अपनाइए, पर हिंदी को नीचा मत दिखाइए।
हिंदी बोलना देसीपन नहीं, आत्मसम्मान है। इसे अपनाएं, जीएं, और भारत को उसकी असली ताकत दें।
आर के झा भोपाल।