जातिवाद से भी खतरनाक है पार्टीवाद!
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समाज में कुछ ऐसे विचार होते हैं जो सतह पर दिखते तो साधारण हैं, पर उनकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। जातिवाद एक ऐसा ही विचार है, जिसने सदियों से हमारे समाज को बाँध रखा है। यह एक ऐसी बीमारी है जो हमें अलग करती है, पर हम में से कई इसे अपना गौरव मानते हैं। लोग अपनी जाति को देखते हैं और उसी आधार पर अपने नेता, अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। इस तरह, एक अयोग्य व्यक्ति सिर्फ इसलिए चुना जाता है क्योंकि वह 'हमारी' जाति का है। जातिवाद एक दीवार खड़ी करता है जो हमें एक-दूसरे से दूर रखती है, पर फिर भी, इसमें एक प्रकार की सीधी सादगी है: तुम मेरी जाति के हो, तो मैं तुम्हें वोट दूँगा। यह एक संकीर्ण सोच है, पर यह एक साफ और सरल रेखा खींचती है।
पार्टीवाद: जब नैतिकता की बलि दी जाती है!
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पर अगर आप जातिवाद को एक खाई मानें, तो पार्टीवाद एक गहरा, अँधेरा और खतरनाक कुआँ है। यहाँ बात सिर्फ एक व्यक्ति की जाति की नहीं होती, बल्कि उस पार्टी के प्रति हमारी अंधभक्ति की होती है। पार्टीवाद में, विचारधाराएँ गौण हो जाती हैं और पार्टी का झंडा सर्वोपरि हो जाता है। यह एक ऐसी मानसिकता है जहाँ हम यह भूल जाते हैं कि जिस नेता को हम वोट दे रहे हैं, वह क्या है और क्या नहीं। चाहे वह चोर हो, डकैत हो, या बलात्कार का आरोपी हो, अगर वह हमारी पार्टी का है, तो हम उसकी आँख मूँद कर जय-जयकार करते हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ नैतिकता, ईमानदारी और न्याय जैसे मूल्य धूल में मिल जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, भारत की राजनीति में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को उनकी पार्टी का टिकट मिला और वे जीत भी गए। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाला सहित कई भ्रष्टाचार के आरोप लगे, फिर भी वे अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता बने रहे और पार्टी के समर्थक लगातार उनके पक्ष में खड़े रहे। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे पार्टीवाद, नैतिकता से ऊपर हो जाता है। इसी तरह, समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान का मामला भी पार्टीवाद का एक प्रमुख उदाहरण है। उन पर कई गंभीर आरोप लगे, फिर भी वे अपनी पार्टी के सबसे शक्तिशाली चेहरों में से एक रहे और उनके समर्थक उनके पक्ष में डटे रहे।
पार्टीवाद का गहरा असर
जातिवाद में कम से कम हम अपने 'भाई-बंधु' को चुनते हैं, भले ही वह गलत हो। पर पार्टीवाद में हम एक ऐसी संस्था के प्रति वफादारी दिखाते हैं जो शायद हमारे समाज और देश के लिए बिल्कुल सही नहीं है। हम जानते हैं कि हमारी पार्टी का नेता भ्रष्टाचार में लिप्त है, पर फिर भी हम उसे ही वोट देंगे, क्योंकि 'हमारी पार्टी' सबसे महत्वपूर्ण है। यह पार्टीवाद हमें विवेक से दूर कर देता है और हमें एक ऐसी भीड़ बना देता है जो सिर्फ एक झंडे के पीछे दौड़ती है, बिना यह सोचे कि वह झंडा हमें कहाँ ले जा रहा है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनावों में 43% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। यह आँकड़ा दिखाता है कि पार्टीवाद के चलते मतदाता नेता के चरित्र के बजाय पार्टी की पहचान को ज़्यादा महत्व देते हैं। यह एक ऐसा खतरा है जो जातिवाद से भी कहीं अधिक खतरनाक है क्योंकि यह हमें सोचने से रोकता है। यह हमारे भीतर तर्क और सवाल करने की क्षमता को खत्म कर देता है। इसीलिए, जातिवाद की खाई को पार करना तो संभव है, पर पार्टीवाद के इस गहरे कुएँ से निकलना बहुत मुश्किल है।
आज हमें यह समझने की ज़रूरत है कि असली लोकतंत्र, सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं है। असली लोकतंत्र तब है जब हम अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं। जब हम यह देखते हैं कि कौन हमारी भलाई के लिए काम कर रहा है और कौन सिर्फ अपना हित साध रहा है। हमें जाति और पार्टी के चश्मे को उतारकर, एक नागरिक के रूप में सोचना होगा। केवल तभी हम एक बेहतर और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर पाएंगे। यह सच है कि जातिवाद एक अभिशाप है, पर पार्टीवाद एक ऐसा ज़हर है जो हमारे समाज की आत्मा को धीरे-धीरे मार रहा है।
आर के झा भोपाल