काँच की बोतल का मातृत्व!
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भोजपुरी गायिका ने जर्मनी के स्पर्म बैंक से बीज खरीदकर मां बनने की घोषणा की है। सुनने में यह आधुनिक प्रयोग है, पर भारतीय संस्कृति के संदर्भ में यह गहरी चोट है।
भारतीय परंपरा में संतान केवल शरीर की उपज नहीं, बल्कि वंश, कुल और धर्म का विस्तार है। गीता में संतानोत्पत्ति को “कुल-धर्म की रक्षा” कहा गया, वहीं मनुस्मृति ने विवाह संस्था को जीवन का शुचि मार्ग माना। यहां पुत्र केवल रक्त का नहीं, बल्कि संस्कार और संबंधों का वाहक है।
जब कोई स्त्री बिना विवाह और बिना पिता की पहचान के विदेशी प्रयोगशाला से संतान लाती है, तो यह मातृत्व केवल कृत्रिम प्रयोग रह जाता है—न कुल, न वंश, न संस्कृति, केवल व्यक्तिगत अहंकार। यह वही मातृत्व है जो काँच की बोतल में पलता है—जीवित अवश्य, पर सुगंधहीन।
“देवी” कहलाने वाली स्त्री यदि संस्कृति की जड़ों को काट दे, तो वह देवी नहीं, पश्चिमी उपभोक्तावाद की प्रतिनिधि बन जाती है। विज्ञान साधन है, साध्य नहीं। साधन को साध्य बना देंगे तो मातृत्व भी बाजार का उत्पाद लगेगा, न कि ईश्वर का वरदान।
आर के भोपाल।