एक छोटे से पर्वतीय देश ने सदियों से धर्म और राजनीति को एक ही धागे में पिरोकर अपनी अस्मिता को बचाए रखा।
प्रश्न उठता है—भारत नेपाल की राह पर क्यों नहीं गया? इसका उत्तर सरल नहीं है। भारत के अभिजात वर्ग ने, औपनिवेशिक शिक्षा की भूलभुलैया में चलते-चलते, अवचेतन में ही पश्चिमी यूरोईसाई सेकुलरता का मीठा ज़हर पी लिया। यह सेकुलरता, सुनने में उदार, दिखने में आधुनिक और बोलने में प्रगतिशील थी, परंतु वस्तुतः धर्मविरोध का ही दूसरा नाम थी। अंग्रेज़ों के बनाए पाठ्यक्रम और उनके बौद्धिक अनुचर आज भी भारतीय शिक्षाव्यवस्था में धर्म को "अंधविश्वास" ठहराकर खारिज करते हैं। परिणाम यह हुआ कि भारत का डॉमिनेंट वर्ग, भले ही मंदिरों की घंटियां सुनता रहा हो, पर भीतर ही भीतर धर्म से कटा हुआ, संशयग्रस्त और जड़ों से विमुख होता चला गया।
लेकिन समय हमेशा एक सा नहीं रहता। इंटरनेट और मोबाइल के प्रसार ने पिछले पंद्रह वर्षों में इस एकांगी वर्चस्व को तोड़ा। लोगों ने इतिहास को नए सिरे से पढ़ा, खुद को पहचाना, और सत्य का वह स्वर बहाल किया, जिसे दशकों से दबा दिया गया था। इसका राजनीतिक परिणाम स्पष्ट है—मोदी सरकार का लगातार तीसरी बार सत्ता में आना। हालांकि यह भी कहना ज़रूरी है कि यह सरकार कोई धर्मनिष्ठ सत्ता नहीं है, बस अन्य सरकारों की तुलना में कम धर्मविरोधी है। यह राष्ट्रप्रेमी है, और सेकुलर फ्रेमवर्क के भीतर रहते हुए भी, भारत की अस्मिता के करीब खड़ी दिखती है। इसलिए अधिसंख्य हिंदुओं की मनःस्थिति ऐसी है मानो कह रहे हों—“टेढ़ा है, पर फिलहाल मेरा है।”
दूसरी तरफ नेपाल की कहानी बिल्कुल अलग है। वहां धर्मविरोध का पाठ नया-नया और अचानक थोप दिया गया। सदियों पुराना राजतंत्र, जो नेपाल की सांस्कृतिक पहचान और धर्म का संरक्षक था, एक सिलसिलेवार साजिश के तहत समाप्त कर दिया गया। राजपरिवार की रहस्यमयी हत्याएं और उनके बाद लोकतंत्र के नाम पर थोपे गए प्रयोग—ये सब किसी भी जागरूक आंख को पश्चिमी ताकतों की भूमिका की ओर इशारा करते हैं। यही कारण है कि आज नेपाल में लोकतांत्रिक राजतंत्र की वापसी के स्वर बुलंद हो रहे हैं। यह आवाज़ केवल राजनीति की नहीं, आत्मा की पुकार है।
पशुपतिनाथ मंदिर पर हमले की खबरें इस पूरे परिदृश्य को और भी स्पष्ट करती हैं। यह कोई साधारण हमला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आस्था पर चोट है। यह बताता है कि वैश्विक राजनीति के जिहादी और पश्चिमी हस्तक्षेपकारी तत्व नेपाल की अस्मिता को भी तोड़ने पर आमादा हैं। परंतु सवाल यह है—क्या नेपाल अपने देवत्व और परंपरा की रक्षा कर पाएगा? या भारत की तरह उसे भी लंबा चक्कर काटकर वापस अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा?
नेपाल के आंदोलन और युवाओं की भूमिका ।
आज काठमांडू की गलियों से लेकर पोखरा और तराई तक, युवाओं की आवाज़ गूंज रही है। यह वही पीढ़ी है, जो राजतंत्र को बचपन की कहानियों में सुनती रही और लोकतंत्र को एक अधूरा वादा मानकर जीती रही। वे देख चुके हैं कि बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप ने उनके देश की आत्मा को कैसे उलझा दिया है। यही युवा अब झंडे लेकर सड़कों पर उतरे हैं—कोई केवल रोजगार की मांग नहीं कर रहा, बल्कि अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और राजनीतिक स्थिरता की पुनर्स्थापना चाहता है।
इन युवाओं का आंदोलन महज़ “राजनीतिक” नहीं है, यह गहरी धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना से उपजा है। वे राजतंत्र को तानाशाही नहीं, बल्कि अपने धर्म और राष्ट्रीय पहचान के संरक्षक रूप में देख रहे हैं। इसी कारण आंदोलन का स्वर “लोकतांत्रिक राजतंत्र” है—एक ऐसा ढांचा जिसमें आधुनिक राजनीतिक संस्थाएं हों, परंतु राष्ट्र की आत्मा परंपरा और धर्म से जुड़ी रहे।
इतिहास गवाह है कि जब युवा वर्ग उठ खड़ा होता है, तो कोई भी सत्ता अधिक दिन तक टिक नहीं पाती। नेपाल की सड़कों पर उमड़ा यह ज्वार, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की ही तरह, अपने समय का निर्णायक क्षण हो सकता है। और यदि इस बार जनता और युवा वर्ग अपनी आस्था पर दृढ़ रहे, तो नेपाल केवल राजनीतिक अस्थिरता से नहीं निकलेगा, बल्कि अपनी आत्मा को फिर से पा लेगा।
भारत और नेपाल, दोनों की राहें भले अलग-अलग मोड़ों से गुजर रही हों, लेकिन गंतव्य एक ही है—धर्म और संस्कृति की जड़ों से जुड़कर आत्मा को बचाना। भारत ने अपने अभिजात वर्ग की ग़लतियों के बावजूद जनमानस के सहारे यह संतुलन साध लिया। नेपाल अभी चौराहे पर है, जहां युवाओं की हुंकार यह तय करेगी कि उनका राष्ट्र किस ओर मुड़ेगा।
सत्य यही है कि यदि धर्म और संस्कृति राष्ट्र के जीवन से काट दिए जाएं, तो लोकतंत्र भी खोखला हो जाता है और राष्ट्र भी खोखली आत्मा का बोझ ढोता है। भारत को चेतना बनाए रखनी होगी कि उसका “टेढ़ा” भी एक दिन सीधा होना चाहिए, और नेपाल को साहस रखना होगा कि वह अपनी अस्मिता की जड़ों में लौटकर आधुनिकता और परंपरा का वह संगम रचे, जो उसे फिर से स्थिर और विराट बनाए