बंगाल फाइल्स !
इतिहास और सिनेमा का
साहसिक सामना
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विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'बंगाल फाइल्स' केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी दस्तावेज़ है जो हमें इतिहास के कुछ अनसुने और गहरे जख्मों को फिर से देखने पर मजबूर करती है। यह फिल्म 16 अगस्त 1946 को हुए 'डायरेक्ट एक्शन डे' यानी 'ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स' की भयानक सच्चाई को पर्दे पर उतारती है। ये वो दिन था जब कलकत्ता की गलियों में बर्बरता ने अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।
इतिहास के तथ्य इस हिंसा की भयावहता को चीख-चीखकर बयां करते हैं। ब्रिटानिका के अनुसार, इस खूनी खेल में 4,000 से ज़्यादा लोग मारे गए और 100,000 से अधिक लोग बेघर हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ने तो इन आँकड़ों को और भी डरावना बताया, उनके मुताबिक, मरने वालों की संख्या 5,000 से 10,000 के बीच थी और लगभग 15,000 लोग घायल हुए थे। अग्निहोत्री ने इसी दर्दनाक इतिहास को अपनी फिल्म का आधार बनाया है।
फिल्म में दंगा पीड़ितों से बात करने के बाद गांधी का यह कहना कि "अब मेरा बकरी का दूध पीने का समय हो गया है," उनके अहिंसा के दर्शन पर एक सवाल खड़ा करता है। ऐसे समय में जब देश जल रहा था और सांप्रदायिक हिंसा चरम पर थी, गांधी जैसे महापुरुष की भाषा कई लोगों को असहज और अप्रभावी लगी थी। इतिहासकार सुमित सरकार ने भी अपने लेखन में इस बात को स्वीकार किया है कि गांधी का नैतिक दबाव कभी-कभी व्यावहारिक राजनीति को मुश्किल में डाल देता था।
फिल्म इसी असहजता को नाटकीयता के ज़रिए प्रस्तुत करती है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।
फिल्म पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि इसमें तथ्यों के साथ अतिशयोक्ति की गई है। जैसे कि गांधी और जिन्ना के बीच संवाद में "प्रिय छोटे भाई" जैसे जुमलों का इस्तेमाल। लेकिन, हमें यह समझना होगा कि सिनेमा इतिहास का कोई अकादमिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि कला का एक रूप है। सिनेमा प्रतीकों और अतिशयोक्ति के माध्यम से ही अपने संदेश को प्रभावी बनाता है। जिस तरह 'शिंडलर्स लिस्ट' ने नाज़ी अत्याचार को दृश्य-प्रतीकों से एक अमर स्मृति में बदल दिया, उसी तरह 'बंगाल फाइल्स' भी 'डायरेक्ट एक्शन डे' की त्रासदी को हमारी यादों में एक स्थायी जगह देने का प्रयास करती है।
फिल्म की लंबाई और उसमें दर्शाई गई हिंसा की अधिकता की भी आलोचना हो सकती है। पर क्या यह जानबूझकर नहीं किया गया? फिल्म का यही उद्देश्य है कि वह दर्शकों को इस त्रासदी की भयावहता से सीधे रूबरू कराए। 'सेविंग प्राइवेट रेयान' या 'डनकर्क' जैसी युद्ध फिल्मों की तरह, यहाँ भी कैमरा हिंसा पर तब तक ठहरता है जब तक कि दर्शक उस भयावह यथार्थ से पूरी तरह रुबरु न हो जाएं।यह अतिशय हिंसा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास में ऐसी भयानक घटनाएं भी घटी हैं।
अंत में, यह कहना कि फिल्म केवल एक राजनीतिक प्रोपेगेंडा है, कला की स्वतंत्रता को सीमित करना है। क्या कला कभी पूरी तरह से तटस्थ हो सकती है? अगर वामपंथी सिनेमा ने दशकों तक श्रमिक और किसान संघर्षों को महिमामंडित किया है, तो कड़वी ऐतिहासिक घटनाओं को क्यों नहीं दिखाया जा सकता है?
'बंगाल फाइल्स' राजनीतिक है, और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह हमें किसी एक पक्ष को चुनने के लिए मजबूर करती है, और इस तरह एक विचार की शुरुआत होती है।
हमें यह याद रखना होगा कि इतिहास कोई विज्ञान नहीं है, बल्कि अलग-अलग दृष्टिकोणों से लिखी गई ऐतिहासिक घटनाओं के कहानियों का एक संग्रह है। विवेक अग्निहोत्री ने इन में से एक संस्करण चुना है। भले ही हम इससे सहमत हों या असहमत, यह फिल्म 1946 के भूले-बिसरे, रक्तरंजित अध्याय को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आती है। यही सिनेमा का सच्चा धर्म है— मनोरंजन से आगे बढ़कर, समाज को सवालों के सामने खड़ा करना।
आर.के.भोपाल