Hindi Quote in Blog by Ranjeev Kumar Jha

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सुंदर स्त्री, सुबह का सैर और निरोगी पुरुष!!
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सुबह की धूप का पहला सुनहरा टुकड़ा जैसे ही पेड़ों की डालियों से फिसलकर ज़मीन पर उतरता है, तो पगडंडी पर टहलने वाले सिर्फ़ व्यायाम के शौकीन ही नहीं मिलते, बल्कि जीवन के "रसिक साधक" भी दिख जाते हैं।

कहते हैं कि योग, प्राणायाम और व्यायाम से स्वास्थ्य मिलता है। लेकिन हमारे समाज के अनुभवी लोगों ने एक नया शोध सामने रखा है—एक सुंदर स्त्री यदि रोज़ सुबह टहल ले, तो कम से कम दस पुरुषों का स्वास्थ्य अपने आप सुधर जाता है।

सोचिए, न कोई जिम की फ़ीस, न कोई प्रोटीन पाउडर, न डॉक्टर की दवाइयाँ। बस बगीचे में सुबह-सुबह एक आकर्षक मुस्कान और लयबद्ध कदम। देखते-ही-देखते कई पुरुषों का ब्लड प्रेशर नियंत्रित, हृदय प्रसन्न और आँखें चमकदार हो जाती हैं। रोज़ सैर करने का रहस्य और असली दवा तो वह "दृश्य" है, जिसे देखकर आदमी अपने आप दौड़ लगाने लगता है, चाहे घुटनों में दर्द हो या सांस फूलती हो।

व्यंग्य की बात यह है कि महिलाएँ समझती हैं—वह सिर्फ़ अपनी फिटनेस के लिए चली हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि मोहल्ले के आधे मर्दों की ज़िंदगी उनकी इसी दिनचर्या पर टिकी है। पान की दुकान पर चाय पीने वाले, सुबह-सुबह अख़बार के बहाने बाहर निकलने वाले, या फिर जॉगिंग ट्रैक पर "दौड़ने की कोशिश" करने वाले—सबके सब "स्वास्थ्य लाभार्थी" है। यहाँ "सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना" का कोई बजट नहीं चाहिए। बस एक सुंदर स्त्री का आत्मअनुशासन, और पूरी बस्ती का दिल, दिमाग़ और फेफड़े दुरुस्त।

और फिर यही मर्द, दिन भर दफ़्तर में बैठकर इस सेवा का श्रेय योगा या आयुर्वेद को दे देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि उनकी सेहत का श्रेय किसी बाबा को नहीं, बल्कि उस अनाम "सुबह की अप्सरा" को जाता है, जिसके कदमों की थिरकन में जीवन का संगीत छुपा है।

अंत में यही कहना होगा—अगर समाज में रोग बढ़ रहे हैं, अस्पतालों में भीड़ है, और दवाइयाँ बिक रही हैं, तो इसकी वजह यह भी है कि सुंदर स्त्रियों ने टहलना कम कर दिया है। और जब तक वे वापस अपनी ड्यूटी पर नहीं लौटतीं, तब तक पुरुषों के निरोग होने की उम्मीद मत कीजिए।
आर के भोपाल।

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