बचपन की वापसी!
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जीवन की रेखा बड़ी अजीब होती है।
शुरुआत में हम एक नन्हें बच्चे—मासूम, जिद्दी, रूठने-मनाने वाले।
फिर समय हमें तराशता है, जिम्मेदारियों का बोझ कंधों पर रख देता है।
हम सख़्त हो जाते हैं, अनुशासित, दृढ़, और दूसरों के लिए मार्गदर्शक।
पर देखिए, यही जीवन जब ढलान पर आता है तो फिर से वही दृश्य लौट आता है।
अनुभवों की गाथाएँ धुँधली पड़ जाती हैं,
और बूढ़े चेहरे पर वही बचपन की झलक उभर आती है।
कल तक जो कहते थे—
“खाना है तो यही खाना है। सब्ज़ी नहीं खाओगे तो तंदुरुस्त कैसे रहोगे?”
आज वही कहने लगे हैं—
“मैं ये लौकी, टिंडा नहीं खाऊँगा। मुझे तो पराठा चाहिए, मलाई चाहिए।”
वह जिद, वह नखरे, वह रूठना… सब फिर लौट आता है।
फर्क बस इतना है कि पहले माँ-बाप हमें मनाते थे,
अब बेटा-बेटी अपनी माँ को, अपने पिता को मनाते हैं।
यह दृश्य जितना करुण है, उतना ही सुंदर भी।
क्योंकि यही वह क्षण है जब संबंधों का असली स्वरूप दिखता है।
जिन्होंने हमें चलना सिखाया, अब वही डगमगाते कदमों से हमें देख रहे हैं।
जिन्होंने हमें कड़वी दवा पिलाई थी, अब वही मिठास की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
और फिर स्मृतियाँ…
वो पुरानी गलियाँ, वो भूले हुए शहर, वो बिसरी हुई आवाज़ें।
कभी अचानक किसी जगह का नाम जुबान पर आ जाता है,
जैसे आत्मा समय की सीढ़ियाँ उतरकर अपने बचपन में लौट गई हो।
अतीत उनके लिए वर्तमान बन जाता है, और वर्तमान उनसे फिसल जाता है।
सच तो यही है—बचपन दो बार आता है।
पहली बार जब हम जन्म लेते हैं और दूसरी बार जब उम्र ढल जाती है।
पहली बार हमें माँ-बाप सँभालते हैं,
दूसरी बार हमें अपने ही बच्चे।
और इस पूरे चक्र में एक गहरी सीख छिपी है—
इंसान की मंज़िल कोई पदवी नहीं, कोई दौलत नहीं,
बल्कि वही मासूम बचपन है,
जहाँ रूठना भी खेल है और मनाना भी प्यार।
जीवन आखिरकार हमें वहीं लौटाकर खड़ा कर देता है—
जहाँ से यात्रा शुरू हुई थी।
आर के भोपाल।