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धर्म की ज्योति
धर्म न मंदिर, धर्म न मस्जिद,
धर्म न केवल ग्रंथों की रंजित।
धर्म है अंतर की निर्मल धारा,
सत्य, अहिंसा, प्रेम का सहारा।
धर्म है सेवा, धर्म है त्याग,
धर्म है करना सत्कर्म का राग।
धर्म है भीतर की पवित्र पुकार,
जो बनाता जीवन को सच्चा संस्कार।
धर्म है जब आँसू पोंछे जाते,
धर्म है जब भूखे को भोजन मिल जाते।
धर्म है जब कोई दुखी मुस्कुराता,
धर्म है जब कोई ग़रीब गले लगाता।
धर्म का दीप जलाओ निरंतर,
प्रेम की लौ से हो जीवन सुगंधित।
जहाँ धर्म हो, वहाँ शांति विराजे,
जहाँ धर्म हो, वहाँ ईश्वर साजे।