किसी का दर्द समझना सीखो, हर कोई बोलकर नहीं बता सकता, ग़म-ए-दिल की तस्वीर कभी, अल्फ़ाज़ में खोलकर कोई नहीं बता सकता।
अश्क़ जो पलकों से गिरते हैं, वो किताब-ए-हक़ीक़त होते हैं, मगर हर आँसू का मतलब, कोई तो तोलकर नहीं बता सकता।
इश्क़ की राह में कितने तीर हैं, कितने काँटे छुपे हुए, ये सफ़र कौन-सा मंज़िल देगा, कोई भूलकर नहीं बता सकता।
सबर की चादर ओढ़े हुए हैं, हज़ार ज़ख़्म दिल में लिए, ये कैसा दर्द है बंदे का, कोई देख-समझकर नहीं बता सकता।
रब की ख़ामोशी भी इक पैग़ाम है, थोड़ा सोचो तो समझ आ जाए, हर दुआ का असर कब होगा, कोई झुककर नहीं बता सकता।
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