'युग-निर्माता'
आज एक इंसान से मेरी मुलाकात हुई
ज्ञान का सागर है वो जिससे मेरी बात हुई
जो अपने ज्ञान से पार कराता सबकी नैया
बीच मँझधार में फंसा हुआ है वही खिवैया
बिन वेतन लगा हुआ है, नई तरकीबें सीखने को
अपना सर्वस्व लुटा रहा है, ज्ञान की गंगा बहाने को
सब पटरी पर आ रहा है तो समाज क्यों टीचर को ही छाँट रहा
वह तो ‘युग निर्माता’ है, नित अपना संचित-ज्ञान बाँट रहा
मैंने पूछा - कोयले की खान में क्यों तुम खुद को खपा रहे हो?
जब मेहनत को सम्मान नहीं तो क्यों उन पर समय बिता रहे हो?
हौंसला उसका देखकर मैं निशब्द हो गया हूँ
उसके धीरज को देखकर मैं नतमस्तक हो गया हूँ
उसने कहा-‘शिक्षा-दान’ ही मेरा कर्म है
बिना कोई आकांक्षा, देना ही मेरा धर्म है
कोयले की कालिख में खुद को जब मैं खपाऊँगा
तभी तो ए दोस्त मेरे ! मैं ‘हीरे’ को खोज पाऊँगा
जिंदगी में आज अचानक एक ऐसा पड़ाव आ गया
छीन डस्टर-चाक हाथ से , माउस थमा गया
रास्ते बदल गए हैं पर मंजिल अब भी वही है
घाट चाहे बदल गए हैं पर कच्ची मिट्टी वही है
माली बनकर सींच रहा हूँ आज मैं अपनी बगिया को
पुष्प बन महकाएँगे मेरे शिष्य कल इस दुनिया को
ना ही हार मानी है और ना ही निराश हुई हूँ मैं
ठान लिया है, नहीं डिगूँगी, चलने को तैयार हूँ मैं
शिक्षक हूँ, मुझे अपनी मंजिल से कोई न डिगा पाएगा
प्रलय भी मैं, निर्माण भी मैं, ये वक्त भी पस्त हो जाएगा ।