दरख्तो की टहनियो से जो गिरे फल बेकार हो गये
हमसे मशवरा लेने वाले अब बहुत होशियार हो गये
चले इन रास्तो पर थे कई मरतबा
आज ये रास्त भी हमसे विरान हो गये
कल तक जो सच पर थे जी रहे
वो अब झूठो के तलबगार हो गये
पत्थरो की लकीरे थी जिनकी हर एक बात
उनके भी हर लफ्ज अब लाचार हो गये
और बनावटी लोगो से अब उम्मीद क्या
जिनके किरदार ही बिमार हो गये
हमे रोकने की उनसे उम्मीद क्यो
उनके मकसद हर से तो हम बाहर हो गये