अलहदा हूँ मैं बहुत ए ख़ुशी तुझसे,
गोशा-ओ-गर्दिश का मुझे अब ग़म नहीं।
ये आलम-ए-दर्द, ये सर्द आहें, ये सिसकियाँ,
कमाल है रो रही हूँ मग़र आँखें भी नम नहीं।
थक चुकी हूँ ए ज़िन्दगी तेरी नवाज़िशों से,
कज़ा को भी क्यों रास आये हम नहीं।
तेरे अपने ही देते है बद-दुआ तुझको "कीर्ति"
काश इस दुनियां में होता तेरा जन्म नहीं।
Kirti Kashyap "एक शायरा"✍️
अलहदा = जुदा, अलग
गोशा-ओ-गर्दिश = तन्हाई और विपत्ति, संकट, कठिनाई
कज़ा = मौत, मृत्यु