कितना मुश्किल होता है, किसी के जाने के बाद उसे भूल पाना।
सब कुछ ठहर सा जाता है,
सब कुछ खत्म सा लगता है,
वक़्त हमें काटने लगता है,
भगवान पर से भरोसा उठ जाता है —
कुछ समय तक।
फिर…
धीरे-धीरे सब बदलने लगता है।
वक़्त पर खाना भी होता है,
मन में इच्छाएँ भी जाग जाती हैं,
और भगवान से फिर मांगने लगते हैं।
जिसका सब चला गया,
वो तो कभी लौटकर नहीं आता,
बाकी सब संभल जाते हैं,
आँसू पोंछ लिए जाते हैं,
चेहरों पर मुस्कान लौट आती है…
पर माँ को छोड़कर।
हर दिन उसे और तंग करता है,
जबकि आस-पास के लोग काम में लग जाते हैं।
माँ रोती है…
अंत में माँ ही रोती है,
अंत तक माँ ही रोती है।
और कोई नहीं।